प्रदूषण और बेरोजगारी का मूल कारण बड़े कारखाने

    Dhananjay Singh Rajpoot पहले परंपरागत घरेलू उधोगो को बर्बाद किया गया। उसकी जगह बड़े बड़े कारखाने लगाने वालों को प्रोत्साहित किया गया सस्ते ज़मीन और बिजली दिया गया सस्ता कर्ज और भयंकर सब्सिडी दी गई ये कहकर की सबको रोजगार मिलेगा हुआ उल्टा जो उत्पादन घरों में हो रहा था अब वही उत्पादन बड़े बड़े कारखानों में होने लगा। करोड़ो रूपये के घोटाले होने लगे सब्सिडी खाने होड़ मच गई। जो परम्परागत घरेलू उत्पादन करने वाले थे वो बेरोजगार हो गए। जो उत्पादन करोड़ो लोग मिलकर घरों में…

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वो बेटा जो अपनी माँ को पत्र में लाल सलाम भेजता था…

  मौर्यवंशी शशिकांत मेहता। 15 अप्रैल 1983 में पटना से अपने माँ के नाम भेजे पत्र में चंदू ने लिखा था शायद तुम भी किसी दिन गोर्की(Gorky’s novel )के उपन्यास माँ की करेक्टर बनो और मैं तुम्हारा बेटा उसका नायक जो कभी सड़ी हुई व्यवस्था से कभी समझौता नही करता! लाल सलाम! चंद्रशेखर प्रसाद कुशवाहा उर्फ़ चंदू के हत्या के बाद नई पीढ़ी ने चंदू के माँ को गोर्की के माँ में बदलते हुए सब ने देखा है और देखा माँ की दुःख के सागर को प्रतिशोध के जवाला में…

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खाप पंचायत और पगड़ी रस्म

  प्रेमसिंह सिहाग उत्तर भारतीय समाज गठन की बुनियाद सदियों से खाप पंचायतें रही है।खाप का मतलब होता है आकाश से भी ऊपर व पानी से भी साफ।पिछले एक दशक से कई आपसी द्वेष के मामलों को लेकर मीडिया ने खाप पंचायतों को प्रगतिशील समाज में बाधक के रूप में निरूपित करने की कोशिश की है।सबसे बड़ा मुद्दा समान गोत्र में शादी को लेकर रहा है व खापें कई बार खुलकर हिन्दू मैरिज एक्ट में संशोधन की मांग कर चुकी है। खापों का लिखित इतिहास सम्राट हर्षवर्धन के काल से…

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रिलायंस नवल का कबाड़ी कम्पनी से भारत का सबसे बड़े डिफेंस उत्पादक बनने की कहानी।

  Lakshmipratap Singh गुजरात में 1997 में पुराने जर्जर समुद्री जहाजों को तोड़ के कबाड़ का धंधा करने के लिए “पीपावाव शिप डिस्मैंटलिंग एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड” नामकी एक कंपनी बनी। इधर मार्च 1998 गुजरात में भाजपा की सरकार आयी, उधर नयी बनी कम्पनी को “गुजरात पिपाव पोर्ट लिमिटेड” का शिप तोड़ने का काम मिल गया। सन 2001 में आडवाणी की सिफारिश पर अटल जी ने केशुभाई पटेल को हटा कर मोदी जी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया। अगले साल चुनाव से पहले गोधरा का साबरमती कांड हुआ जिसके बाद…

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समझें कैपिटलिज्म का असली मॉडल।

                     Avinash Kakde भारत सरकार कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (कॉनकोर) को अडानी को बेच रही है लेकिन अब अचानक कॉनकोर रेलवे की जमीनें खरीद रहा है .. उसका कारण क्या है..? कॉनकोर भारतीय रेलवे का ही औद्योगिक आर्म है। कॉनकोर के 86 में से 41 ICDs (Inland Container Depot) रेलवे की जमीन पर बने हैँ जिनमे तुगलकाबाद और दादरी जैसे बड़े ICD भी शामिल हैँ जिनपे पास पड़ोस के राज्यों का निर्यात निर्भर करता है। रेलवे की ये जमींनें शहर के…

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करेंसी, बैंकिंग और रोथ्स्चाइल्ड एम्पायर।

अखिलेश धाकड़ रोथ्स्चाइल्ड एम्पायर को जानने से पहले करेंसी के आगमन और उसके पीछे छुपे काले सच को जानना बहुत जरूरी है। पुराने समय मे सारी दुनिया में गुड्स और सर्विसेज का एक्सचेंज बार्टर सिस्टम पर आधारित था। जैसे नाई के पास बाल कटवाने के बदले गेंहूं, लोहार से औज़ार बनवाने के बदले बाजरा या कुम्हार के बर्तनों के बदले मक्का। स्थानीय ट्रेड के रूप से इस सिस्टम में कोई खामी नहीं थी। इसीलिए इंडिया जैसे देश में यह सिस्टम अभी 15-20 साल पहले तक भी काफी प्रचलित था क्योंकि…

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क्या एक जैसी है तालिबान और आरएसएस की विचारधारा ?

Avinash Kakde (लेखक भारतीय किसान सेवा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, मराठा सेवा संघ के नेता सामाजिक विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं) आजकल अफगानिस्तान में जो कुछ हो रहा है, उससे सारी दुनिया चिंतित है और इस मुद्दे पर दुनिया भर में, सभी वर्ग-विशेष में व्यापक और विस्तृत चर्चा हो रही है. इसी क्रम में अपने कुछ विचार सभी के समक्ष रखना चाहता हूं! दुनिया में तीन तरह की सत्ता होती है. वे हैं धर्मसत्ता, अर्थसत्ता और राज्यसत्ता. उपरोक्त सत्ताओं में जब कभी भी घालमेल हुआ, तो उस देश में सुशासन…

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हीरे की तलाश

  (लेखक प्रवेश भालसे पेशे से शिक्षक ( प्रोफेसर) हैं ।इतिहास,पुरातत्व एवं अन्य सामाजिक विषयों पर लेखक के लेख और कहानियां विभिन्न साहित्यिक पटलों पर प्रकाशित और प्रसारित होती रहती हैं।)   हीरे की तलाश। हीरे की तलाश में खो रहे है जो है पास में हीरे की चमक में देख नही पा रहे क्या दे रही कुदरत हमे हीरे के लिए काट रहे है जंगल उजाड़ के जंगल बकस्वाहा कर रहे प्रकृति को स्वाहा, हीरे निकालने की नही विनाश की है तैयारी जंगल पर चली जो आरी भड़की जो…

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कृषिक्षेत्र में कॉरपोरेट की घुसपैठ । Pro. H.R.ISRAN

किसान संगठनों एवं कुछ विपक्षी दलों के तमाम विरोध को अनसुना और दरकिनार करते हुए सरकार ने इन बिलों को बिना किसी संशोधन के संसद से पारित करवा लिया है। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ ही ये कानून बनने वाले हैं। 13 सितम्बर को एक आलेख पोस्ट किया था, जिसमेंकृषि सुधार से जुड़े इन अध्यादेशों से किसानों के लिए क्या खतरे उत्पन्न होने वाले हैं, इनको उजागर किया था। उसी की निरंतरता में पुनः स्पष्ट कर रहा हूँ कि ये तीनों बिल पूरी तरह बड़े व्यापारियों और कंपनियों के…

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सरकारी सौजन्य से सरकारी ख़ज़ाने की लूट-खसोट

प्रोफेसर हनुमाना राम ईसराण (पूर्व प्राचार्य ,कॉलेज शिक्षा ,राजस्थान)   ” All that glitters is not gold.” चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती। यह कथन शेक्सपियर का है।जिन लोकलुभावन योजनाओं का सरकार बड़े धूम- धड़ाके से प्रचार- प्रसार कर रही है, उनमें से अधिकांश तो निजी कंपनियों और कॉरपोरेट घरानों को चोर दरवाज़े से फ़ायदा पहुंचाने के मक़सद से लॉन्च की गईं हैं। करदाताओं द्वारा चुकाई गई धनराशि बीमा कंपनियों को लुटाकर सरकार वाह-वाही लूट रही है। ‘पहली बार, पहली बार’ का झुनझुना बजाकर लुटेरों से देश और आमजन…

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