संजीव कुमार सांगवान
अगर किसान एक लाइन में अपने सवाल का उत्तर पूछे तो देश के 99% नेताओ के पास उसका उत्तर नही है।वह लाइन है कि जिस प्रकार पक्ष और विपक्ष मिलकर अपनी तनख्वाहें और भत्ते सांसद मे बैठकर बिना बहस के चुपचाप बढ़ा लेते हैैं
“ठीक उसी प्रकार किसान के साथ पक्ष और विपक्ष मिलकर उसकी मेहनत और खुन पसीने से उगाई गई फसल पर लागत से आपकी तनख्वाह और भत्ते वृद्धि जितना प्रतिशत बढ़ाकर खरीदने का आश्वासन दे सकते हो ?”
आपका जनप्रिय और लाडला,किसान पुत्र,फलाणा,धकाणा नेता आपके सामने चंद सैकंड भी नही ठहर पायेगा..सही मायने में किसान को कही भी अपनी बात और दर्द रखने का मौका नही मिलता और न ही उसे वहां तक पहुंचने दिया जाता है जहाँ उसकी आवाज की सुनवाई हो सके।नही तो धरा पर हल चलाने वाला किसान एक शब्द से इन सरकारो और प्रशासन के मुहँ पर ताला लगा सकता है।
लेकिन बंद कमरे और संगठनो की शीर्ष नेतृत्व से वार्ता में आज तक किसान के लिये कोई भी हल निकला हो तो बताइये।क्योंकि उसमे उस किसान शामिल ही नही किया जायेगा जिसके मुद्दो और मांगों पर बातचीत होगी।उसे यह कहकर चुप करा दिया जायेगा तू चुपचाप बैठ जा तुझे बातचीत करने का नही पता।बना बनाया काम बिगाड देगा।जबकि इस प्रकार की वार्ता का सीधा सा सार है कि बिना गोपनियता के धरती पर बैठे किसानों के समक्ष उनके नेतृत्व के सामने एक मजबूत आत्मीय रसूख और संजीदा जमीर रखकर होनी चाहिए।लेकिन यहां सब अपने अपने हित साधकर समझौतो और शर्तो के साथ सरकार और किसान के बीच के अन्तर को बरकरार रख खुद के अस्तित्व को स्थापित कर महज आश्वासन और जी हजूरी की अनुपालना कर किसान को उसी दोराहे मार्ग पर खड़ा कर देते हैं।कल कोई और मसीहा या नेतृत्व मिलेगा बड़ी साफ छवि से आयेगा।
कुदरत की मार और सरकार की मार को दृश्यपटल पर रख सुनहरे सपनो का आगाज करेगा।लेकिन किसान फिर भी किसान होता है वह उसे भी मौका देता है।यह पीढ़ी दर पीढ़ियों से जारी है..और रहेगा।क्योकि राजनेताओ की कोई फसल और खेत नही हैं उनकी फसल और खेत आप हम सभी किसान है जिसे वह समय समय पर खाद और पानी अन्दोलन और धरनो के माध्यम से देते रहते है ताकि आप उनके अहसानो के कर्ज से दबे रहे और उनहे अपना मसीहा समझते रहे।
पिछले हर किसान आंदोलन को ऊठाकर देखियेगा वही का वही मिलेगा जो आज चल रहा है या हो रहा है।रत्ती भर भी परिवर्तन हुआ हो तो आपके और आपके नेताओ में..
सार:- किसान जब तक अपना मसीहा खुद नही बनेगा तब तक उसे यह छल और भ्रमजाल यू हीं लीलता रहेगा।
हे किसान आप परम हो और मेरा सौभाग्य है कि दोनो पहर जब भोजन को स्पर्श करता हूँ उस अन्नदाता परमेश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि किसान की रहमत इस सृष्टि में अपरम्पार है।
