वो बेटा जो अपनी माँ को पत्र में लाल सलाम भेजता था…

 

मौर्यवंशी शशिकांत मेहता।

15 अप्रैल 1983 में पटना से अपने माँ के नाम भेजे पत्र में चंदू ने लिखा था शायद तुम भी किसी दिन गोर्की(Gorky’s novel )के उपन्यास माँ की करेक्टर बनो और मैं तुम्हारा बेटा उसका नायक जो कभी सड़ी हुई व्यवस्था से कभी समझौता नही करता!
लाल सलाम!

चंद्रशेखर प्रसाद कुशवाहा उर्फ़ चंदू के हत्या के बाद नई पीढ़ी ने चंदू के माँ को गोर्की के माँ में बदलते हुए सब ने देखा है और देखा माँ की दुःख के सागर को प्रतिशोध के जवाला में बदलते हुए।

चंदू के हत्या के एक महीने बाद सरकार से ऐसी कोई करवाई नही हुए जिससे उनकी माँ को न्याय दिला सके
चंदू के माँ ने 29 अप्रैल 1997 में संसद मार्च के दौरान कहा था–
पुरे हिंदुस्तान के कोनो कोनो में मेरे चंद्रशेखर है मुझे कोई गम नही है और इस लड़ी जारी रखें ।।

20 सितम्बर 1964 को बिहार के सिवान में जन्मे चंद्रशेखर प्रसाद को लोग चंदू के नाम से जानते हैं| इनके पिता का नाम जीवन सिंह और माँ का नाम कौशल्या देवी है| आठ साल की उम्र में पिताजी का देहांत हो गया। शुरुआती शिक्षा गाँव में ही ली, बाद में तिलैया के सैनिक स्कूल से आगे की पढ़ाई की। चंदू को देश की सेवा करनी थी।उन्होंने इंडियन नेशनल डिफेंस एकेडमी भी ज्वाइन किया। लेकिन वहाँ उन्हें एहसास हुआ, देश की सेवा के लिए उन्हें राजनीति का रास्ता अख्तियार करना चाहिए। वो लौट आये पटना विश्वविद्यालय के छात्र बने। छात्र ही नहीं, छात्र नेता बने।आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के बिहार यूनिट के वो उपाध्यक्ष थे।

1993-94 में JNU से जुड़ने के बाद, राजनीति और जन सेवा में गहरी रुचि रखने वाले चंदू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी विचारधारा के लोग कायल बनते गये। आइसा से जुड़ने के बाद वो लगातार छात्रों की समस्याओं के लिए लड़ते रहे। कई बार अपनी व्यक्तिगत जिन्दगी को पीछे रख कर अन्य छात्र के हित में कदम उठाये। उनके मुद्दों में व्यापकता थी। सिर्फ छात्रों और विश्वविद्यालय ही नहीं, देश के अन्य हिस्से में चल रही लड़ाई में भी भागिदार बने। एक बार JNU छात्र संघ के उपाध्यक्ष बनने के बाद लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गये। भारत में ‘पूर्ण लोकतंत्र’ की स्थापना का उद्देश्य उन्हें आगे बढ़ाता गया।

यूनिवर्सिटी छोड़ के जनसमूह के बीच में काम करने के मकसद से अपने राज्य में वापस आये। उन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा था। 3 अप्रेल 1997 को होने वाले भाकपा(माले) के बिहार बंद को सफल बनाने के लिए 31 मार्च को सिवान के जे.पी. चौक पर थे। उस नुक्कड़ सभा को संबोधित करने का मकसद जनता से इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए अपील करना था।
तात्कालिक सरकार में शामिल शहाबुद्दीन को साफ़ तौर पर अपने लिए खतरा दिख रहा था।वो जानते थे इस बार मुद्दा उनके द्वारा फैलाये जा रहे हिंसा और भ्रष्टाचार का होगा।वो जानते थे कि ये शख्स उनकी जड़ों को उखाड़ के फेंक सकता था।शहाबुद्दीन के खौफ की वजह से जनता में कोई ऐसा नहीं था जो उसके खिलाफ आवाज उठा सके।उस नुक्कड़ सभा में और उसके बाद भी यही दुस्साहस चंदू करने वाले थे।

उसी सभा में चंदू और उनके एक साथी को गोलियों से भून दिया गया। शहाबुद्दीन के खिलाफ उठने वाली आवाज को हमेशा के लिए शांत कर दिया गया।इसके परिणाम स्वरुप पूरा JNU आंदोलित हो गया। दिल्ली में बिहार निवास के साथ-साथ प्रधानमंत्री कार्यालय तक पर आन्दोलन हुआ| सीवान की सड़कों पर जन सैलाब उमड़ पड़ा। ये आन्दोलन चलता रहा| इसका नेतृत्व खुद चंदू की माँ ने किया।वो माँ कितनी मजबूत रही होगी जिसका बेटा पत्र में उसे लाल सलाम भेजता हो!

तात्कालिक सरकार ने गुनाहगारों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाये। शूटरों को गिरफ्तार किया गया, उम्र कैद की सज़ा भी हुई, लेकिन असल गुनाहगार को किसी तरह का नुक्सान नहीं होने दिया गया।

चंदू एक तेज-तर्रार, जज़्बे वाले और स्पष्ट विचारधारा के साथ चलने वाले ऐसे व्यक्तित्व का नाम है जो आज भी लोगों के ज़ेहन में है और प्रेरणा देता है।उनका एक ही मकसद था- “समाज से जो लिया है, हमें समाज को वो देना पड़ेगा।” चंदू आज भी छात्रों और छात्र नेताओं के आदर्श हैं।

अपनी एक सभा में चंदू ने कहा था- “हम अगर कहीं जायेंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी, जिसको डिफेंड करने की बात हम सड़कों पर करते हैं| और अगर व्यक्तिगत महत्वकांक्षा होगी तो भगत सिंह के जैसे शहीद होने की महत्वकांक्षा होगी, न कि JNU के इलेक्शन में गाँठ जोड़ जीतने या हारने की महत्वकांक्षा होगी|”

उनकी शहादत उनके इन शब्दों को चरितार्थ करती है| उनको जानने वाले लोग कहते हैं, “चंदू के कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था|” अपने भाषणों में वो जिस आदर्श की बात करते थे, निजी जीवन में समाज के प्रति अपनी उसी जवाबदेही और जिम्मेदारी के साथ उतरते थे।
लोग इंकार नहीं करते कि अगर आज चंदू हमारे साथ होते तो एक बड़े जननेता के तौर पर देश की सेवा कर रहे होते। अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षा में वो अक्सर कहा करते थे कि “हाँ मेरी व्यक्तिगत महत्वकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन और चे ग्वेरा की तरह मौत।”

चंदू जैसे स्वछन्द मानसिकता के नेता बहुत कम होते हैं, जिनमें समाज अपनी बेहतरी की सम्भावनाएँ तलाशता हो।ऐसे जिंदादिल, प्रबुद्ध, मार्क्सवादी नेता के जन्मदिन का उत्सव मनाया जाना चाहिए।

पटनाबीट्स के एक कविता बिहार से में आज जो कविता शामिल हो रही है वो चंदू के लिए लिखी गयी है। उन्हीं की एक मित्र, निवेदिता शकील जी की लिखी हुई ये कविता चंदू और समाज के आत्मीयता को दिखाने के लिए पर्याप्त है। निवेदिता जी पेशे से पत्रकार हैं।सामाजिक आन्दोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं। नटमंडप में एक्टिंग कर चुकी हैं और फ़िलहाल एक कविता संग्रह की पुस्तक ‘ज़ख्म जितने थे’ के जरिये साहित्यिक संसार में भी कदम रख चुकी है।

बिहार के राजनीति में तीन ऐसे मौर्यवंशी का नाम शहादत देने में जुड़ा जो व्यक्तिगत नहीं बल्कि शाषण व्यवस्था में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्तियों के लिए शहादत दी, जिसमें एक नाम 1970 के दशक में 100 में 90 शोषित हैं और शोषित भाग हमारा है के नारा दे गोलबंदी करने वाले शहीद जगदेव प्रसाद का आता है तो दुसरा पुरे बिहार में शोषण बंचित तबकों के संगठित नक्सल आंदोलन को खड़ा करने वाले शहीद जगदीश मास्टर को और तीसरा 1990 के दशक में शाषण व्यवस्था में बंचित लोगों को एकत्रित करने वाले जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर प्रसाद सिंह कुशवाहा उर्फ चन्दू का…….. ।।

आज बिहार को समाजवाद की विचारधारा का सबसे मजबूत गढ़ के रूप में जाना जाता है तो इसमें इन तीनों मौर्यवंसियों की संघर्ष व बलिदान के बजह से हीं, जिसके शहादत पर आज कुछ राजनीतिक ठेकेदार लोग अपने आपको सामाजिक न्याय का मसिहा बनें घुम रहें हैं !!

चंद्रशेखर उर्फ चंदू के जन्म दिवस पर उन्हें शत्-शत् नमन करते हुए लाल सलाम…….. !!

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