हीरे की तलाश

 

(लेखक प्रवेश भालसे पेशे से शिक्षक ( प्रोफेसर) हैं ।इतिहास,पुरातत्व एवं अन्य सामाजिक विषयों पर लेखक के लेख और कहानियां विभिन्न साहित्यिक पटलों पर प्रकाशित और प्रसारित होती रहती हैं।)

 

हीरे की तलाश।

हीरे की तलाश में
खो रहे है जो है पास में
हीरे की चमक में
देख नही पा रहे क्या दे रही कुदरत हमे
हीरे के लिए काट रहे है जंगल
उजाड़ के जंगल बकस्वाहा
कर रहे प्रकृति को स्वाहा,

हीरे निकालने की नही
विनाश की है तैयारी
जंगल पर चली जो आरी
भड़की जो चिंगारी
आएंगे सब इसकी जद में
एक दिन आएगी मानव की भी बारी,

आज को बनाने
लगे है कल को जलाने
आज का आलाव
कल एक फैलाव होगा
चिंगारी बनी आग की जद में
कल सारा गांव होगा,

ख़त्म होगी सारी नस्ले जीवन की,
पंछी सारे उड़ जाएंगे
जब अपने आशियाने से बिछुड़ जाएंगे,
ना वन होगा न जीवन होगा
ना छाँव होगी,ना होगा नदी झरना
फिर धरती छोड़ मानव को
चाँद और मंगल पर होगा उतरना,

कभी वर्षा होगी बाढ़
कभी सुखी होगी आषाढ़,
मिट्टी जब नही थामेंगे झाड़
तब दरकेंगे पहाड़
धरती भी हिल जाएगी
जब धरती छील जाएगी,

यह तपिश,यह बढ़ती ठंड
यह ग्लोबल वॉर्मिंग
है प्रकृति की अलार्मिंग
ये सबब प्रकृति का सब्र है
विकास की दौड़ में
मानव बना रहा अपनी ही क़ब्र है,

विकास की रेल में हम कहाँ तक जाएँगे
जीवन के सफर में अगली पिढ़ी को
किस स्टेशन तक ले जाएंगे,
कर्जदार होंगे वो जब ऑक्सीजन खरीद के लाएंगे
जब मास्क लगाना होगा रूटीन
और खुली हवा में सांस लेना टास्क होगा
जब डाटा फ्री होगा और पानी महँगा
और लेना सबको चन्द्रमा और मंगल ग्रह पर आवास होगा
तभी असली विकास होगा।

-‘निम्मित’प्रवेश✍️🌳

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