Avinash Kakde
(लेखक भारतीय किसान सेवा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, मराठा सेवा संघ के नेता सामाजिक विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
आजकल अफगानिस्तान में जो कुछ हो रहा है, उससे सारी दुनिया चिंतित है और इस मुद्दे पर दुनिया भर में, सभी वर्ग-विशेष में व्यापक और विस्तृत चर्चा हो रही है. इसी क्रम में अपने कुछ विचार सभी के समक्ष रखना चाहता हूं!
दुनिया में तीन तरह की सत्ता होती है. वे हैं धर्मसत्ता, अर्थसत्ता और राज्यसत्ता. उपरोक्त सत्ताओं में जब कभी भी घालमेल हुआ, तो उस देश में सुशासन कभी नहीं रहा. तीनों सत्ताधीशों को एक-दूसरे का सहारा लेकर जनता से खिलवाड़ करने का मौका मिल जाता है.
राजसत्ता का नियोजन मूलभूत शारीरिक , सामाजिक और भौतिक जरूरत के लिए किया जाना चाहिए. धर्मसत्ता का नियोजन मानसिक और अधिभौतिक जरूरत के लिए किये जाना चाहिए. जबकि अर्थसत्ता राजसत्ता का मूलाधार है.
जनहित के लिये अर्थसत्ता और धर्मसत्ता पर नियंत्रण रखने का काम राज्यसत्ता को करना होता है, मगर दुनिया में ऐसे भी देश हैं, जहां के शासक अर्थसत्ता चाहते हैं या मात्र धर्म की सत्ता चाहते हैं! यह सवाल भी उन देशों में समय-समय पर उठता रहा है.
अभी कुछ दिनों से हम देख रहे हैं कि अफगानिस्तान मेवतालिबानी इस्लामिक सत्ता स्थापित हो गई है और वहां का आम आदमी भयभीत है, क्योंकि उन्होंने कारण धर्म के नाम पर हासिल की गई अथवा धर्म के नाम पर चल रही सत्ता कैसी होती है? यह बात अफगानी लोग बहुत पहले ही देख चुके हैं. कहा जा सकता है कि भारत में आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंमसेवक संघ) और अफगानिस्तान में तालिबान, धर्म के नाम पर (या उसकी आड़ में) शासन करना चाहते हैं.
आज हम आरएसएस यानि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और तालिबान दोनों की सोच, व्यवहार और तरीका कैसे मिलते-जुलते हैं, यह देखते है.
1) ये दोनों ही संगठन प्रगट रूप से सांस्कृतिक उत्थान और धर्म रक्षा के लिए स्थापित हैं.
2) उक्त दोनों ही संगठन कट्टरता चाहते हैं.
3) दोनों संगठन शस्त्र धारण करते हैं!
4) एक संगठन 1400 साल पहले की व्यवस्था चाहता है, तो दूसरा संगठन भी हजारों साल पहले की व्यवस्था चाहता है!
5) दोनों संगठनों को वर्तमान व्यवस्था से या वर्तमान जनता की इच्छा से कोई भी मतलब नही है.
6) दोनो संगठन धर्म के नाम पर धार्मिक कानून के अनुसार सत्ता स्थापित करना चाहते हैं.
7) दुनिया के सारे वर्तमान धर्म पुरुष-सत्तात्मक होने के कारण सब सत्ता पुरुषों के अधीन चाहते हैं!
8) दोनों को वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से चिढ़ है!
9) दोनों ने शिक्षा संस्थानों को तबाह कर धर्मग्रंथ आधारित शिक्षा पर काम किया है!
10) दोनों संगठन महिलाओं की शिक्षा के विरोध में है. भारत के संगठन की इस मुद्दे पर गोलमोल नीति है.
11) दोनों संगठन महिलाओं को सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन समझते हैं!
12) दोनों संगठन आज्ञाधारी समाज बनाना चाहते हैं!
13) दोनो संगठनो के लोग अपने विरोध की कोई आवाज सुनना-देखना नहीं चाहते.
14) दोनो संगठन अपने से अलग विचार रखने वालो को देशद्रोही बताते हैं.
15) दोनो संगठन सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को देश और उसके विचारों को राष्ट्रीय विचार मानते हैं.
16) दोनो संगठन धर्म और राष्ट्र बचाने के नाम पर हिंसा करते रहते हैं.
17) समाज की मतभिन्नता दोनों को मंजूर नहीं है.
18) लोकेच्छा और लोकतंत्र के द्वारा चलने वाली सरकारों का विरोध मूल स्वभाव है!
19) दोनों के शासन में अल्पसंख्यक समाज को मानव का दर्जा नहीं होता.
20) दोनो के शासन में एक व्यक्ति (शासक) का हुक्म सर्वोपरी माना जाता है!
21) दोनो संगठन जनता क्या खाये और क्या ना खाये, यह तय करना चाहते हैं.
22) दोनो संगठन जनता के ड्रेसकोड को तय करते हैं. अर्थात कौन क्या पहनेगा और क्या नहीं पहन सकता, यह तय करने का अधिकार चाहते है!
23) दोनों संगठनों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से परहेज है.
24) महिला स्वतंत्रता दोनों संगठन नहीं चाहते. महिलाओं को आजादी लायक भी नहीं मानते!
25) दोनों ही संगठनों का विचार है कि महिलाओं को स्वतंत्रता देने से परिवार, धर्म और देश की हानि होती है!
26) महिलाओं को कोई बुद्धि नहीं होती, कोई सोच भी नहीं होती… यही दोनों की धारणा है!
27) महिला ने कितने बच्चे पैदा करना चाहिए, यह बात दोनों संगठन तय करना चाहते हैं!
28) दोनों की मंशा दुनिया में उनके धर्म का प्रसार-प्रचार करना, यही दिखाने की होती है!
29) दोनों का छिपा एजेंडा अपने सुप्रीमो के लिए निर्विरोध सत्ता की चाहत है!
30) दोनो संगठन जनता अशिक्षित और बेकार रहे, ऐसा नियोजन करते हैं.
31) लोगों को अविचारी , अशिक्षित और निर्धन रखकर उनका मनचाहा दुरुपयोग करना ही दोनों संगठनों की मंशा है.
32) दोनों संगठन धर्म-रक्षा के लिए जन-सामान्य के लड़के चाहते हैं!
33) दोनो संगठन धर्म के खतरे में होने की दुहाइयां देते रहते हैं!
34) दोनों संगठन मानवता की जगह धर्म को प्राथमिकता देते हैं!
35) दोनों संगठन, धर्मों की व्याख्या अपने मन मुताबिक करते हैं.
36) सहिष्णुता से दोनॉन को परहेज है!
37) दोनों संगठन का नेतृत्व अपने लिए शस्त्र, आधुनिक सुविधा चाहता है, मगर जनता को पुरातन काल की व्यवस्था देते हैं!
38) दोनो संगठन मानव की किसी भी प्रकार के आजादी के खिलाफ है!
39) दोनों संगठन लोकतान्त्रिक व्यवस्था को धर्म के खिलाफ मानते हैं.
40) दोनों संगठन धार्मिक संविधान चाहते हैं.
41) दोनो संगठनों को मानवीय संविधानो से ऐतराज है.
42) दोनों संगठन व्यक्ति से बड़ा राष्ट्र और राष्ट्र से बड़ा धर्म मानते हैं.
43) दोनो के पास जनता के सवालों के जवाब नहीं है, इसलिए सवाल करने वाले को विरोधी मानते हैं.
44) विरोधियों की हत्या करना/ करवाना वे अपना अधिकार मानते हैं!
45) दोनों संगठन हिंसाचार को जरूरी मानते हैं!
46) दोनों संगठन समाज में शासन और धर्म का भय पैदा करते हैं!
47) भयभीत जनता दोनों का शासनाधार है!
48) दोनों को वर्तमान जरूरतों से कोई लेना-देना नहीं है!
49) दोनों ही मरने के बाद की व्यवस्था के पूजक है!
50) संघियों का सपना हिंदू-राष्ट्र और तालिबानियों का सपना मुस्लिम-राष्ट्र का है!
51) दोनों संगठन हथियारों के दम पर बदलाव चाहते हैं!
यह सूची और भी लंबी हो सकती है, लेकिन विस्तार भय से मैं यहीं रुक जाता हूं. लेकिन इन सारी बातों से आपके समझ मे यह तो आ ही गया होगा कि चाहे तालिबानी हो, या आरएसएस…. दोनों एक ही विचारधारा के हैं और राष्ट्र की प्रगति एवं शांति में बाधाएं पैदा करते हैं.
दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि तालिबानी ठसक दिखा कर दबंगई से बात करते हैं और ये मधुर वाणी में पूरी होशियारी से बात करते हैं! अगर आपको मेरे विचार सही या गलत भी लगते हैं, तो कृपया बेझिजक संपर्क कर सकते हैं.
लेखक:
अविनाश काकडे,
नागपुर ४४००३३
