कृषि अध्यादेशों से आगे क्या ? Mahak Singh Tarar

 

महक सिंह तरार

सरकार खेती सुधार के लिए जो 3 अध्यादेश लायी थी वो अब कानूनी जामा पहनकर किसानों की नियति निर्धारित करने को अग्रसर हैं। पिछले दशक मे MSP को बढ़ाने के लिए आंदोलन होते थे आज नौबत ये है कि बस MSP बच जाए। किसान हितैषी थिंक टैंक Ramandeep Singh Mann , सरदार V M सिंह, देवेंदर शर्मा इत्यादि एक साल पहले किसानों को 18000 हजार रुपये महीने की मिनिमम गारन्टिड इनकम पर विमर्श चला रहे थे। पर आज सरकारी दांव के सामने कोशिश कर रहे हैं कि सरकार बहादुर बस फसल खरीद ले। हाल ऐसा है कि एक बच्चा खिलौने की ज़िद कर रहा था, उसे सरकार ने ऊंची दीवार पर बैठा दिया। बच्चा रोये की उतारो डर लगता है। सरकार कहती कि खिलौना लेना है या दीवार से उतरना है? बच्चा कहता खिलौने नही चाहिए बाप बस जैसे भी नीचे उतार दो। उधर सरकार का अलग दावा है कि वो 2022 तक किसानों की इनकम दुगनी करने को प्रतिबद्ध है और इसलिये उन्हें मार्किट से जोड़कर बेहतर दामों का रास्ता मुहैया करा रही है। पक्ष विपक्ष के दायरों से परे कुछ सवाल हैं जिन्हें ना सरकार सुनना चाहती ना किसान नेता। पहले 5 सवाल सरकार से।

1) सरकार के तीनों अध्यादेश किसानों को स्वीकार है, बस सरकार मंडी के अंदर-बाहर MSP से नीचे खरीद को कानूनी जुर्म का अध्यादेश/कानून ले आये। पर सरकार बहादुर ऐसा करने को तैयार क्यों नही?

2) ये कानून बिहार जैसे प्रदेश मे पहले से लागू है वहां मंडी खत्म हो गयी और फ्री मार्किट फोर्सेज ने किसान को ऐसा लूटा की आज भी बिहार से व्यापारी किसानों से औने पौने दाम मे धान खरीदकर ट्रांसपोर्ट करके हरियाणा की मंडियों मे बेचते हैं तब भी ट्रांसपोर्ट खर्चे काटकर उन्हें प्रॉफिट बचता है। बिहार का आदमी पंजाब आकर धान लगाने की मजदूरी कर लेता है मगर काफी ज़मीन खाली छोड़ देता है क्योंकि फसल के लागत मूल्य भी नही निकलते। तो सरकार बहादुर बताये की फ्री मार्किट इकॉनमी मे जब ये मॉडल पहले से फैल है तो किसको फायदा पहुंचाने के लिए ये कानून लाये गये?

3) अमेरिका व तमाम यूरोप का फार्मर मार्किट इकॉनमी से जुड़कर भारी आर्थिक संकट मे है और वहां की सरकारों द्वारा दी जाने वाली भारी सब्सिडी के दम पर खेती करता है। वहां भी किसान आत्महत्या ओर फैमिली फार्म फेलियर चरम पर है तो सरकार बहादुर क्या 500 Rs महीने की सम्मान निधि से भारतीय खेती को बचा पायेगी?

4) अभी तक कि तमाम कांग्रेस/भाजपा सरकारें गेट/डंकल/डब्लूटीओ इत्यादि अंतरराष्ट्रीय समझौतों मे किसानों को मिलने वाली सहायता को बंद करने की शर्तें मानती आयी है। तो क्या सरकार उपरोक्त संधियों के पालन की बाध्यता के कारण घरेलू किसानों के नुकसान को अनदेखा करके अघोषित तरीके से MSP खत्म करना चाहती है?

5) सरकार अगर मार्किट इकॉनमी को इतना ही मानती है तो 1980 से खेती मे प्रयोग होने वाले उपकरणों, फर्टीलाइजर, डीजल इत्यादि के दामो को सोने के मूल्यों के आधार या सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह के आधार पर पैरिटी मानकर किसानों को लाखों करोड़ रुपये के under रिकवरी को एरियर के तौर पर क्यों नही देती? किसान वर्ग को गरीबी हटाने के वास्ते मार्किट प्राइस ना देकर CACP के द्वारा कम MSP दिया गया जिसे स्वामीनाथन आयोग ने भी बताया था, ओर अब आर्थिक संसाधन विहीन किसानों को कॉर्पोरेट के सामने खड़ा होने की उम्मीद सरकार किस आधार पर देखती है?

6) आज जो सरकार है उसने मेनिफेस्टो मे बाकायदा लिख कर कहा सत्ता मिलते ही स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करेंगे। मगर 6 महीने मे सुप्रीम कोर्ट मे लिख कर दे दिया कि लागू नही कर सकते। और पिछले साल कह दिया कि लागू कर दी। ऐसी आंखों मे आंखे डालकर झूठ बोलती सरकार का भरोसा किसान कैसे करे?

=====अब किसानो(व उनके नेताओ)से सवाल====

1) जिस मंडी को बचाने के लिए आज आप संघर्षरत है क्या उसी मंडी सिस्टम मे आपको MSP मिलता था? क्या मंडी व्यवस्था से आपकी समस्या का समाधान हुआ था? अगर समाधान नही हुआ था तो आप लोगो ने मंडी व्यवस्था सुधारने को कभी जोरदार आंदोलन किये? विपक्ष अपनी जगह ठीक है क्योंकि आप से वोट लेने है तो वो आपको भड़काता है ओर सत्ता मे आते ही जो पहले वाली सरकार करती थी ठीक वही पालिसी लागू करता है। क्या आप लोग लगातार विपक्षी पार्टियों (विपक्ष मे चाहे भाजपा हो या कांग्रेस) के मोहरे बनकर आंदोलनरत रहकर कर्महीनता की तरफ नही बढ़ते?

2) सरकार पहले PDS मे बांटने के लिए MSP पर फसलें खरीदती थी ओर उत्पादन भी कम था। अब सरकारें गरीबी हटाने के बजाये गरीब हटाने मे ज्यादा व्यस्त है। सरकारी गोदाम अगले तीन सालो तक के खाद्यान्न से भरे पड़े होने के कारण सरकार अब मात्र 6% उत्पादन MSP पर खरीदती है तो 94% किसानों के लिए आपके पास क्या रास्ता है? क्या किसी विपक्षी नेता ने सरकार को गालियां देने के अलावा आपको फसल चुनाव पर सलाह दी है, जैसे चौधरी चरण सिंह देते थे? या गांव मे पांच आदमियों की बारात, दहेज जैसी कुरीतियों को घटाकर आपके खर्चे कम करने की कोशिश की हो जैसे बाबा टिकैत करते थे? किसानों मे कोई कम्युनिटी आधारित सिस्टम सुझाया जो बिना सरकार के ही चलते है। या आपके सारे नेता आपको सिर्फ ये बताते है की अगली बार वोट किसे देना है?

3) कोई भी जीवन संघर्ष हो सर्वाइवल ऑफ दा फिटेस्ट (मतलब जो मजबूत होगा वही) जीतता है। आज आपका डर जायज है कि कॉर्पोरेट पैसे के दम पर सीजन मे सस्ती खरीदी करके आपको कॉम्पिटिशन मे नही टिकने देगा। पर आपको आर्थिक तंगहाली मे पहुंचाने के लिए क्या ये किसान नेता और विपक्ष ज़िम्मेदार नही जो आपको मार्किट से जोड़ने के रास्ते फारवर्ड लिंकिंग/प्रोसेसिंग करने की बाते संसद मे तो करते है मगर ज़मीन पर भाषणों द्वारा सिर्फ ये साबित करना उद्देश्य है कि सब काम सरकार करेगी। क्या सरकार सब करेगी वाली मानसिकता के गुलाम बनकर आप 365 दिन मे से 300 दिन नेताओ के पीछे बोलेरो मे सवार हो, सफेद कुर्ते पहनकर नही घूमते? ओर इस घूमने से आपका फायदा है या रोजगार विहीन (विपक्षी) नेता का? इन किसान नेताओ ने जैसे अपने परिवार के लोगो को आगे बढ़ाया क्या वही राय ये आपको भी देते है या आप बस सड़क पर लठ खाने के लिये है? इन्होंने आपकी आर्थिकी मजबूत करने के लिए कोई व्यक्तिगत प्रयास किया? और ऐसे किसान नेता जो खुद खेती नही करते फिर भी SUV मे चलते है उनका भरोसा किसान कैसे करे?

4) सबसे बड़ा वोट संख्या होने के बावजूद आप किसी का वोटबैंक नही है। अगर हरबार गैर राजनीतिक प्रतिनिधियों का एकजुट गुट सबके सामने बैठकर राजनीतिक दल से मोल तोल करके एक साथ वोट करे तो आपकी मांगे हरेक दल पूरी करेगा। ये मैंने खुद बाबा टिकैत के ज़माने मे कई कई बार बिजली के बिल माफ करवाने या फसलों के दाम बढ़वाने या प्रशाशनिक समस्याओं के हल होते देखा है। बाबा टिकैत पंचायत मे बैठकर बात करते थे। जबकि पिछले बीस सालों से बाबा टिकैत की औलाद खुद हरेक आंदोलन को बीच मे अनिर्णीत छोड़ती है। बाकी के आपके नेता दिल्ली जाके चुपचाप बात करते है क्यों?

=========मेरी सलाह: ===========

नेगेटिव माइंड से पॉजिटिव समाधान निकालना लगभग असंभव है। 24 घण्टे नेगेटिव रहकर पुरुषार्थ की ताक़त कम होती है और कुछ करने के बजाये निराशा घर कर लेती है। मेरी पॉजिटिव कोशिश होगी कि आपको कुछ ऐसे किसानों से मिलवाया जाए जिन्होंने खुद को आर्थिकी मोर्चे पर मजबूत किया। आप सरकार से लड़िये, हक़ मांगिये, जरूरी भी है, पर साथ साथ एक हाथ से खुद को आर्थिक मजबूत करने की कोशिश जारी रखिये। पैसे वाले उद्योगपतियों को देखो फिक्की, एसोचैम, सीआईआई जैसे प्रेशर/लॉबी ग्रुप बना कर बैठे है। कोई रोड जाम नही करते और किसानों से चार गुणा कर्जा माफ करवा लेते है। गरीब होने से हक़ मिलते तो इस देश मे 32 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे है उन गरीबो का नामलेवा नही फिर किसान तो मात्र 11 करोड़ है। हक़ लेने के लिए भी पैसे की ताक़त चाहिये। सड़क पर लड़ो पर विपक्षियों द्वारा दी सीख पर निर्भर ना रहकर खुद को पुरुषार्थ से भी जोड़ो।
महक सिंह तरार

Related posts

Leave a Comment