डॉ.मुकेश कुमार मीणा।
अगर लोकत्रंत वास्तविक है तो कोई संस्था या नियम आपदा के समय देश के किसी भाग में फंसे लोगो की मदद करने से दूसरी संस्था या लोगो को नही रोक सकता है ,उसका मापन उसके कार्यो से ही होगा । लेकिन यदी लोकतन्त्र केवल सैद्धान्तिक है तो साधन होने के बाद भी उपयुक्त लोगो तक सहायता पहुंचे यह जरुरी नही है ।सहायता नियमो और कानूनों में फँस कर रह जायेगी । आइये इण्डिया के लोकतंत्र का इस आधार पर मूल्यांकन करते हैं:-
इंडिया के संविधान में केंद्र राज्य सरकारों के मध्य विषयों का बंटवारा किया गया है जिसका तार्किक आधार बहुत कमजोर है, लगभग सभी आर्थिक साधनों ,महत्वपूर्ण संसाधनों , सुरक्षा उपकरणों और आपदा नियन्त्रण उपकरणों ,दुसरे राज्यों से समन्वय और सहायता ,विदेशो से सहांयता और सहयोग पर केंद्र का नियन्त्रण है । जिससे वो आम जनता की सीधे भागीदारी नही होती है ।
भागिदारी विहीन मिडिया , जूडिशियरी, उच्च प्रशासन ,उद्योगपतियों के पैसे से चुनाव लड़े सांसदों की लॉबियां इसका निर्णय निर्धारण करती हैं।
अगर किसी राज्य में बाढ़ ,भूकम्प,सुनामी या अन्य कोई प्राकृतिक आपदा भी आ जाये तो भी केंद्र से सहायता कुछ लोगो के व्यक्तिगत निर्णय पर ही निर्भर करती है जबकि ये संसाधन राज्यों के ही हैं ।
इसी प्रकार राज्यों का निर्माण भी भाषा के आधार पर किया गया है ना की विकास के लिए आवश्यक साधनों या आत्मनिर्भरता को देखकर किया गया है ।अर्थात वर्गीकरण का कोई वैज्ञानिक आधार नही है।कुछ राज्यों के क्षेत्रो में साधन आवश्कता से अधिक हो सकते हैं और कुछ के पास आवश्कता से कम ,अर्थात साधनों की अपर्याप्तता राज्यों के गलत विभाजन से उत्पन्न है ।
जैसे गुजरात को सर्वाधिक समुद्री किनारा दिया है जिसपर बन्दरगाह और व्यापारिक इकाईया संभव हैं जो MP ,राजस्थान,महाराष्ट्र के इलाको को लैंड लोक बनादेता है। अर्थात कोई भी व्यापार गुजरात से होगा और कच्चा माल पीछे के क्षेत्र सप्लाई करेंगे अर्थात लाभ गुजरात को मिलेगा और मेहनत पश्च क्षेत्र के राजस्थानी ,मराठी और MP के लोग करेंगे। ऐसी ही स्थिति एक राज्य में नगरीय और ग्रामीण क्षेत्री के बीच भी हो सकती है यह भी व्यवस्था के विषय के गलत बटवारे के कारण है।
यह सारी व्यवस्था इंडिया में फैली आत्मनिर्भर ग्रामीण व्यवस्था को समाप्त कर स्थापित की गयी । ग्रामीण आत्मनिर्भर व्यवस्था में समुदाय सदियों से आपदा के समय बिना किसी नियम में बंधे आपदाग्रस्त लोगो की सहायता करते आ रहे हैं।
अंग्रेजो ने इस अनौपचारिक आत्म निर्भर व्यवस्था को धीरे धीरे समाप्त किया और व्यक्ति व्यक्ति ,समुदाय समुदाय के संबंधो में राज्य को स्थापित कर दिया । पहले अंग्रेजो ने इंडियन को सभी अधिकारों से विहीन किया और फिर 1920 और 1935 के एक्ट में राज्यों को कुछ अधिकार दिए ,
1935 के एक्ट के विषयों के विभाजन को संविधान सभा ने लगभग समान रूप से अपना लिया ।इस प्रकार संविधान से राजशाही से भी अधिक केंद्रीकृत व्यवस्था का निर्माण हुआ जो आम व्यक्ति समुदाय की भागीदारी को निर्णय प्रकिया में हिस्सेदारी रोकती है। ऐसी व्यवस्था शोषित लोगो से सहानुभूति तो रख सकती है लेकिन समानुभूति नही ।
वोटिंग का अधिकार सबको मिल जाने से लोकतन्त्र सैद्धान्तिक तो हो सकता है लेकिन वास्तविक नही ।वास्तविक लोकतन्त्र तो स्थानीय गणों आत्मनिर्भर इकाईयो के माध्यम से ही आ सकता है .

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