विकाश आंनद
हमें किस्सों में किसी काल्पनिक चाणक्य की कहानी सुनाई जाती है कि वह सरकारी काम और अपने निजी काम के लिए अलग-अलग आवास और दिया रखते थे।
पर उत्तर प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री और मानवतावादी दार्शनिक रामस्वरूप वर्मा जी वास्तव में वित्त मंत्री रहते हुए भी अपने काम से कहीं भी आने-जाने के लिए रिक्शा या टैम्पू या रेलगाड़ी का ही प्रयोग करते थे। आज उनकी जयंती है। भाग्य-भगवान, अन्धविश्वास, ढोंग-पोंग-पाखंड, पुनर्जन्म, पूर्वजन्म, जात-विवाद, चमत्कार, बाबा-बूबी, मठ-मंदिर, चिलम-चिमटा, जैसी व्यर्थ की कुरीतियों और परम्पराओं के ख़िलाफ़ ऐसी मुहिम और लेखन कार्य किया कि अभी भी उनके लिखे को बस एक बार पढ़ना ही काफ़ी है, इन संकीर्णताओं और शोषण के तंत्र को समझते हुए मुक्ति की राह तलाशने के लिये।
एक मात्र वित्त मंत्री जिन्होंने सदन में लाभ का बजट प्रस्तुत किया था। वो वित्त मंत्री किसी क़िताब से अर्थशास्त्र पढ़कर ही नहीं आये थे बल्कि किसान परिवार से आये थे। रामस्वरूप वर्मा अक्सर कहा करते थे कि “किसान से अच्छा इकोनॉमिक्स का दूसरा मास्टर हो नहीं सकता। जो इतना घाटा सहने के बाद भी अपना व्यवसाय नहीं बदलता। अगर आपको अर्थशास्त्र सीखना है और तो किसान के खेत में काम करके सीखिए।…अगर देश के लोगों का मुख्य काम और धंधा किसानी है तो नीतियों के केंद्र में भी किसान और किसानी ही होने चाहिए, न कि कुछ और।”
रामस्वरूप वर्मा का यह नज़रिया चीनी नवनिर्माण के प्रस्तोता माओ चे तुंग के उस ज़मीनी नज़रिए से मेल खाता है जब उन्होंने सारे विश्वविद्यालयों को बंद करवाकर प्रोफेसर्स और अध्यापकों को गांवों-देहातों में भेज दिया था। और उन्हें भेजते हुए यह निर्देश दिया था कि ‘गांव में जाइए, वहाँ के लोगों के काम करने के तरीक़े, उनके विचार, विचार करने के तरीक़े, उनके अनुभवों, उनकी परम्पराओं से सीख कर आइए।’
एक बार बागपत में किसी सड़क का निर्माण हो रहा था। ठेका दिया जा चुका था। ठेकेदार ने वर्मा जी से कहा कि ‘पैसे रिलीज कर दें।’ वर्मा जी ने सड़क और सामान की क्वालिटी देखने के बाद धन निर्गत करने की बात कही। इस पर वह ठेकेदार तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह के पास पहुँच गया और बोला कि पैसे पास करवा दें। चौधरी साहब ने ठेकेदार को ज़वाब दिया कि, “इस मामले में मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ। फ़िर भी उनसे जाकर कह दीजिये कि हमने कहा है कि पैसे पास कर दें।”
रामस्वरूप वर्मा ने ठेकेदार को लताड़ते हुए कहा कि, जाकर अपने मुख्यमंत्री साहब से कह दो, कि “अगर उन्हें बिना जाँच-परख के ऐसे ही धन लुटाना है तो हमें मंत्रालय से निकाल दें, हम कभी जनता का पैसा मनमानी तरीक़े से नहीं बाँट सकते हैं।”
इतना कहने के बाद वर्मा जी ठेकेदार के साथ ही बागपत सड़क को देखने पहुँच गए, घटिया माल और काम देखकर ठेकेदार के ऊपर उखड़ गए और कहा कि, “इसलिये ही तुम सारा पैसा निकालने के फ़िराक में थे न।” और तत्काल ठीकेदार के ख़िलाफ़ थाने में रिपोर्ट लिखवाये। पैसे तो नहीं ही रिलीज़ किया।
बाबू जगदेव प्रसाद के साथ मिलकर रामस्वरूप वर्मा जो अलख जगाई और जिस मिशन की शुरुआत किया, भारत की राजनीति आज भी उसी केंद्र के इर्द-गिर्द घूम रही है। लेकिन जगदेव बाबू और अर्जक संघ के स्लोगनों को कांशीराम ने शब्द बदलकर ख़ूब मार्केटिंग किया, और राजनैतिक अवसरवाद और अविश्वास की परिपाटी में आख़िरी कील ठोंकी।
जयंती पर स्मृतियों को नमन।
