प्रशांत भूषण केस और कोलेजियम सिस्टम पर उठी पहली बुलंद आवाज उपेंद्र कुशवाहा।

मौर्यवंशी शशिकांत मेहता

आज सुप्रीम कोर्ट में एक ऐतिहासिक फैसला आया । ऐतिहासिक फैसला इस मायने में और भी हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की आलोचना करने पर सुप्रीम कोर्ट जजेज जाने-माने वकील प्रशांत भूषण को अवमानना करने के जुर्म में एक कठोर फैसला सुना कर आम जनता में यह संदेश देने की कोशिश में थे । उद्देश्य था लोकतंत्र में कोलेजियम सिस्टम से चुने गए जजेज द्वारा एक नागरिक के तौर पर जनता के दिए गए आलोचना के अधिकार पर एक तरह से खत्म करना । हालांकि आज अंतिम फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ आलोचना को असंवैधानिक ही माना, पर इससे खुद प्रशांत भूषण के सहारे सुप्रीम कोर्ट की जितनी फजीहत हुई वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहले कभी भी नहीं हुई थी ।

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना के मामले में बड़े ही सख्त तेवर के साथ प्रशांत भूषण को दोषी करार दिया और 20 अगस्त को सजा सुनाने का दिन मुकर्रर किया । इसकी सोशल मीडिया से लेकर आम जनता में सुप्रीम कोर्ट की बहुत फजीहत हुई और देखते ही प्रशांत भूषण एक नायक के रूप में स्थापित हो गए । इसकी भनक सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी लगी और 20 अगस्त को सजा सुनाने के दिन ऐसा लगा कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने झुककर प्रशांत भूषण से सुलह करना ही बेहतर समझा । जजों की बेंच ने कहा अगर प्रशांत भूषण माफ़ी मांग लें तो वो सजा से बच सकते हैं और उन्हें मोहलत देते हुए अगली सुनवाई की तारीख रखी 24 अगस्त । लेकिन प्रशांत भूषण ने साफ़-साफ़ शब्दों में मांफी मांगने से ना सिर्फ मना कर दिया बल्कि सुप्रीम कोर्ट से जो सजा देनी उसे देने का आग्रह तक कर डाला । इतने से ही प्रशांत भूषण पूरे देश में एक नायक के तौर उभर गए । फिर 24 अगस्त को जजों की बेंच बैठी तबतक प्रशांत भूषण लोगों के दिलों पर विद्रोही स्वर में पूरे देश में छा चुके थे और उस दिन भी जजों की बेंच ने और समय देते हुए सजा सुनाने की तारीख आगे बढ़ा कर 31 अगस्त यानी आज के दिन कर दी । आज भी प्रशांत भूषण ने माफी नहीं मांगी और सजा काटने की ही बात पर मुखर रहे । अंततः सुप्रीम कोर्ट के जजों की बेंच ने थक-हार कर सजा सुना तो दी पर वह इतनी मामूली थी कि वह सजा देना ना देना बराबर था , सजा के नाम पर सिर्फ एक रुपया जुर्माना भरने की सजा । हां इसको ना भरने के ऐवज में थोड़ी सजा अधिक थी पर कोई भी व्यक्ति इतनी कम सजा करवा भी वह जुर्माना ना भरने की ज़िद करे तो फिर उसे फ़ालतू के ज़िद ही कहा जा सकता है ।

खैर आइए एक बात का विश्लेषण करें कि आज से कुछ समय पहले तक आम जनता को छोड़िए बड़े-बड़े तुर्रम खां टाईप के लोग भी सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करने की हिम्मत नहीं करता था, वहां लोगों में इतनी हिम्मत करके प्रशांत भूषण को रातों-रात नायक कैसे बना दिया ??

जी हां मैं ठीक कह रहा हूं इस तारीख को नोट कर लीजिए 20 म‌ई 2018 । जगह नई दिल्ली के कंस्टीच्युशन क्लब । यहीं वो स्थान व तारीख थी जब पूरे देश में लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के कोलेजियम सिस्टम के खिलाफ सड़क पर आंदोलन की शुरुआत की गई और इसके नेतृत्वकर्ता थे तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री प्रोफेसर Upendra Kushwaha और इस आंदोलन में शरीक होने वाले मेहमान थे 1. श्री विंश्ववर प्रसाद सिंह पूर्व न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट, 2. श्री मुलचंद गर्ग पूर्व न्यायाधीश दिल्ली हाईकोर्ट, 3. श्री सुभाष कश्यप देश के जाने-माने संविधान विशेषज्ञ और 4. प्रोफेसर दिलीप मंडल इंडिया टुडे के पूर्व संपादक व जाने-माने सामाजिक विश्लेषक । और इस आंदोलन का गवाह मैं खुद भी हूं जो खचाखच भरे कंस्टीच्युशन क्लब के हाॅल और इस हाॅल में पैर रखने की जगह नहीं थी तब मुझे पत्रकार दीर्घा में अपने पास बैठने की जगह दी थी द रिपब्लिक प्रेस के पत्रकार, जेएनयू स्काॅलर व हमारे मित्र Dr. Anil Kumar ने ।

इस आंदोलन को शुरू करने से पहले एक बुद्धिजीवी नेता की तरह हीं प्रोफेसर उपेंद्र कुशवाहा जी ने पहले इस पर रिसर्च किया फिर संविधान के विशेषज्ञों से गहन मंथन किया अपनी पार्टी के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर Subodh Kumar जी उनसे देश व पूरी दुनिया के डाटा कलेक्ट करने का आग्रह किया फिर इस आंदोलन को जमीन पर बहुत हीं डिफरेंट स्टाइल में उतारा। बिल्कुल शांतिपूर्ण माहौल में सभी वक्ताओं का इस कोलेजियम सिस्टम पर भाषण हुआ जिसमें दोनों जजों का मत था कि कोलेजियम ठीक है ।पर बाकी सभी वक्ताओं ने इसे सिरे से नकार दिया । जाने-माने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने भी कोलेजियम सिस्टम के विरुद्ध अपना मत दिया ।

अंत में कोलेजियम सिस्टम पर बोलते हुए प्रोफेसर उपेंद्र कुशवाहा ने सवाल पूछते हुए एक बात कहीं जिस पर पूरा हाॅल सुन कर सन्न रह गया । उन्होंने कहा ऐसा क्या कारण है देश के आजादी के 70 साल पूरे होने के बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में मात्र 250 से 300 परिवारों के ही जज हुए ? जो कोलेजियम की व्यवस्था है उस व्यवस्था के तहत जैसे पूराने जमाने का एक राजा अपने राज्य का अपने परिवार का उत्तराधिकारी चुनता था वही व्यवस्था का नाम कोलेजियम सिस्टम है जहां एक जज अपने परिवार के लोगों को जज चुनता है । इसमें SC, ST, OBC घरों के बच्चों को तो छोड़िए एक गरीब ब्राह्मण परिवार का भी बच्चा चाहे कितना भी मैरिट वाला हो वह सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट का जज नहीं बन सकता ,उसके लिए दरवाजे बंद हैं। इस दरवाजे को खोलना होगा और यह तभी संभव है जब कोलेजियम सिस्टम को हटायेंगे वरना हमेशा यहीं होगा ।जब तक कोई जज अपने परिवार का कोई उत्तराधिकारी चुनता रहेगा ये लोकतांत्रिक देश में एक अलोकतांत्रिक व अन्यायपूर्ण व्यवस्था है । ऐसा क्या कारण है कि एक अखबार बेचने वाले एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति बन सकते हैं, एक चाय बेचने वाले का बेटा देश का प्रधानमंत्री बन सकता है तब भी एक आम इंसान का बेटा सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट कोर्ट का जज क्यों नहीं बन सकता है ??

ऐसा नहीं की उपेंद्र कुशवाहा जी ने यह सब सवाल सिर्फ बाहर सड़क पर किया । आप लोकसभा में उनके भाषणों को सुनेंगे तो पता लगेगा उन्होंने एक बार नहीं अनेकों बार कोलेजियम सिस्टम के खिलाफ संसद में आवाज़ बुलंद की । पिछले 70 सालों के इतिहास में संसद में भी सबसे मुखर हो कर कोलेजियम सिस्टम के खिलाफ किसी ने आवाज बुलंद की तो वो सिर्फ़ उपेंद्र कुशवाहा थे ।

मुख्यत: बिहार में सिमटी इनकी पार्टी ने इस आंदोलन को ना सिर्फ दिल्ली व बिहार तक सीमित रखा बल्कि देश के ज्यादातर राज्यों के राजधानी में जाकर इस मुद्दे पर बड़ा-बड़ा संम्मेलन कर बुद्धिजीवियों के बीच अपने इन सवालों को रखा और देश के जाने-माने लगभग सभी बुद्धिजीवियों ने एक स्वर से इस कोलेजियम सिस्टम की मुखालिफत की जिसका परिणाम है कि आज आम आदमी भी अन्यायपूर्ण व्यवस्था कोलेजियम सिस्टम के खिलाफ जागरूक हुआ तथा इसके खिलाफ मुखर हुआ ।

हमारे देश के इतिहास में बड़े-बड़े सामाजिक न्याय के पुरोधा रहे और बड़े-बड़े अपने आपको सामाजिक न्याय का अग्रदूत कहलाने में मशगूल रहने वाले लोगों में से किसी की भी इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ आवाज आपने सुनी ?? आप नहीं सुन सकते हैं क्योंकि यह जो अन्यायपूर्ण व्यवस्था है उसके खिलाफ बोलने का साहस चाहिए, ईमानदारी चाहिए और सबसे जरूरी चीज है उसे बुद्धिजीवी होना चाहिए ,और हमें खुशी है कि ये तीनों चीजों से परिपूर्ण बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर जी के बाद दूसरे बुद्धिजीवी बिहार को नेता मिले ।

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