
अनुज राज पाठक।
आज चहुँ ओर एक हाहाकार है। रोटी चर्चा के केंद्र में आ गई है। मज़दूरों के दर्द पर टीवी चैनल चीख रहे हैं। हमें थोड़ा-सा सोचना चाहिए कि हम कितने बरस बाद रोटी और मज़दूरों पर बात कर रहे हैं। असल में व्यक्ति तब तक वास्तविक दर्द महसूस नहीं कर सकता, जब तक वह ख़ुद उस दर्द में न हो या उसका कोई आत्मीय जन दर्द में न हो।
हम चीख सकते हैं। किसानों की दुर्दशा पर चिल्ला सकते हैं। लेकिन यह चीखना-चिल्लाना बड़ा ही नाटकीय होता है। दरअसल, हम किसान की वास्तविक मेहनत को जानते ही नहीं। कुछ दिन पहले हुई बरसात प्रेमी युगलों के लिए रोमांटिक माहौल बना रही थी। वे ख़ुश थे। नाच रहे थे। सोशल मीडिया पर कविताएँ लिखी जा रही थीं। ओलावृष्टि ने दिल्ली को उनके लिए गुलमर्ग बना दिया था। यह ग़लत नहीं है। लेकिन यही ख़ूबसूरत मौसम किसान युगल के लिए कहर था। आप कह सकते हैं, कहर तो प्रेमी के लिए भी था। पर वहाँ यह कहर प्रेम के उत्कर्ष के कारण था। वहीं दूसरी ओर किसान था। उस पर यह कहर उसकी बर्बादी, उसके रूदन के रूप में टूट पड़ा। किसान की महीनों को अथक मेहनत पर एक बेमौसम बरसात पानी फेर देती है। और उस पर ओले। सब बर्बाद कर देते हैं। खेती करने वाला कभी नहीं चाहता उसकी सन्तान खेती करे। क्यों? क्योंकि वह किसान होने के दर्द को जानता है। मैं किसान का बेटा हूँ। मैं इस दर्द को जानता हूँ। जब उस किसान का थोड़ा-सा कर्ज़ माफ होता है तो पूरी अर्थव्यवस्था हाहाकार कर उठती है। वैसे भी हज़ारों में कुछ ही किसानों का कर्ज़ माफ हो पाता है। बाकी तो बस बैंकों के चक्कर लगाते रह जाते हैं। लोन लेने में भी मिठाई खिलानी पड़ती है। फिर कर्ज़ माफ़ी में तो हिस्सा देना शगुन देने जैसा है।
अभी 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज से आत्मनिर्भरता का प्रेरक सूत्र बताया जा रहा है। हालांकि इस ‘आत्मनिर्भरता’ का मज़ाक भी बनाया जा रहा है, तो न जाने कितने ही ख़्वाब भी बुने जा रहे हैं। लेकिन क्या किसान आत्मनिर्भर है? अरे किसान तो पहले ही आत्म विहीन किया जा चुका है। किसान के पास किसान का क्या है? पहले वह ज़मीनदारी प्रथा से लड़ता रहा। फिर किसी तरह भूमि सुधार लागू हुआ तो कुछ दशा सुधरी। बावजूद इसके देश के किसानों का बड़ा हिस्सा आज भी बँटाई पर काम करता है। वह इस हद तक लोकल है कि विदेशी ब्रांड तो छोड़िये भारतीय ब्रांड भी इस्तेमाल नहीं करता। उसके लिए ब्रांड जैसी कोई वैल्यू है ही नहीं। वह नहीं जानता कि ब्रांड वैल्यू क्या होती है। क्यों? क्योंकि कभी उसे अपना ब्रांड विकसित करने ही नहीं दिया गया। ब्रांड के नाम पर उसका सालाना खर्च उतना भी नहीं होगा, जितना उच्च मध्यम वर्ग का कोई एक नुमाइंदा एक रात में किसी बार का बिल चुका देता है।
बहुत छोटा सा उदाहरण लीजिए। दिल्ली में डेयरी से 55 रुपये किलो दूध मिलता है। वह डेयरी किसान से यह दूध 25 से 30 रुपये किलो के भाव से खरीदती है। बाकी आप किसी भी स्टोर पर चले जाइए। वहां दाल-गेंहूँ चावल के भाव देख लीजिये। फिर उनके दाम की तुलना सरकारी समर्थन मूल्य से कर लीजिये। अंतर ख़ुद पता चल जाएगा। अब आप इसमें सप्लाई चेन से लेकर परिवहन और स्टोरेज जैसी तमाम तकनीकी खर्चों को भी ले आएंगे तो भी किसान को मिलने वाले दाम को न्यायोचित नहीं ठहरा पाएंगे। मैं ख़ुद धान उगाता हूँ। जो चावल दिल्ली के किसी स्टोर में 120 रुपये किलो मिलता है, उसी गुणवत्ता का धान मुझसे मात्र 20 रुपये किलो के भाव खरीद लिया जाता है।
आजकल बहुत देखता हूँ कि फेसबुक पर कोई किसी का लिखा अपने नाम से चिपका दे तो उसके मूल लेखक को आग-सी लग जाती है। सोचिये कि किसान को कितनी आग लगती होगी। मेहनत उसकी। काम उसका। पर न नाम उसका और न ही दाम उसका। अरे किसान तो अपनी मेहनत से उपजाई फसल का मूल्य भी ख़ुद निर्धारित नहीं कर सकता। कल्पना कीजिये उसके साथ कितना बड़ा अन्याय हो रहा है। किसान अपने किसी भी उत्पाद का मूल्य ख़ुद निर्धारित नहीं कर सकता। वह इतना ही आत्मनिर्भर है कि अपनी उपजाई फसल से अपना पेट भर ले।
मूल्य निर्धारण तो छोड़िये। जिन इलाकों में गन्ना मिल लगी हैं, उन इलाकों में किसान अपनी मर्ज़ी से गन्ने की फसल तक अपनी नहीं उगा सकता। पिछले दिनों एक ख़बर थी। गुजरात में चिप्स बनाने वाली फैक्टरी के साथ किसानों का विवाद हुआ था। यह विवाद आलू उत्पादन को लेकर था। किसानों ने उस नस्ल के आलू उगा लिए थे, जिसका कंपनी से अनुबंध नहीं था। इस पर कंपनी ने किसानों पर मुकदमा ठोक दिया। आज किसान लगभग कंपनियों के बीजों पर निर्भर हो चुका है। वह तो इतना परतंत्र है। इतना पराधीन है कि यह फैसला भी नहीं ले सकता कि अपनी धरती पर क्या उपजाए। ऐसे में किसान को किस प्रकार आत्मनिर्भर बनाया जाएगा?
हम सब आज जिन मज़दूरों को पलायन करते देख रहे हैं, जिनके लिए कागज़ काले कर रहे हैं, चीख रहे हैं, संवेदनाएं प्रकट कर रहे हैं, इनमें से ज़्यादातर कभी किसान रहे होंगे। हो सकता है कि वे अब भी किसान ही हों और अपनी ज़मीन अपने किसी चाचा-भाई को इस गरज़ से दे आए हों कि वे उससे पैदा करें और उसके परिवार का पेट भर सकें। और वे ख़ुद दूर अनजान शहरों में निकल आए। ऐसे शहर, जहां सिर्फ़ भवन ही नहीं, बल्कि लोग भी पत्थर के हैं। ये मज़दूर, ये किसान अपने जीवन को आत्मनिर्भर बनाने के लिए परनिर्भर हो कर रह गए। गाँव में खेती करना कठिनतर हो गया है और शहर में जीना। आज ये किसान, जिन्हें हम मज़दूर कहकर इनका अपमान कर रहे हैं, एक भीषण विभीषिका से गुज़र रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिनके परिवारों के परिश्रम के कारण हम अपना पेट भर पा रहे हैं। कुछ एक-दो दशक पहले ‘ब्रेन-ड्रेन’ को लेकर बड़ा हो-हल्ला हुआ था। कितने ही लेख लिखे गए कि भारत के इंजीनियर-डॉक्टर, अच्छे अर्थशास्री बड़ी संख्या में विदेश जा रहे हैं। जब देश को इनके ज्ञान की ज़रूरत थी, तब तो बहुत से लोग विदेश निकल गए। और आज इस बुरे वक़्त में अपने देश को याद कर रहे हैं।
आत्मनिर्भर बनने के लिए सबसे पहली शर्त किसानों का आत्मनिर्भर बना है। अगर किसान आत्मनिर्भर नहीं बन पाया तो आप कितने भी महल खड़े करने की कोशिश कीजिये, वे तमाम महल भरभराकर ढह जाएंगे। क्योंकि अंततः पेट भरने के लिए अन्न ही चाहिए। धन से, सोने से, चांदी से पेट नहीं भरा करते हैं। आज अगर हम एक-एक किसान को अपना ‘फैमली फार्मर’ बनाएं, जैसे फैमिली डॉक्टर होता है, फैमिली मैकेनिक होता है, तो इस एक छोटी-सी पहल से ही बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। साथ में इसका डिविडेंड यह होगा कि देश का बड़ा हिस्सा जो धीमा ज़हर खा-पी रहा है, उसे अमृत मिलेगा। आइये अपना पारिवारिक किसान चुनें।
