विकाश आनंद
अपने ही ज़मीन पर बंधुआ मज़दूर होना और तिस पर अपने हिन्दू होने का गर्व, कभी हिंदी बोलने वाले होने पर गर्व तो कभी कुछ और होने में गर्व।
डायरेक्ट ब्रिटिश राज और परोक्ष ब्रिटिश शासन में अंतर यह आया है कि पहले लोग अपने हित-अनहित को जान समझ रहे थे और उसी अनुरूप प्रतिक्रिया कर रहे थे। लेकिन आज़ाद भारत की ग़ुलाम सरकारों ने अपने बुद्धिजीवियों को जनता के बुद्धिजीवियों के रूप में जिस तरह से इंजेक्ट किया है, वह प्राणघातक बन गया है।
इसकी पहली और सबसे ताकतवर शुरुआत उत्पादन को केंद्रित और गांव, परिवार को विकेन्द्रित करके जवाहर लाल नेहरू ने किया। बड़ी-बड़ी फैक्टरियां, उद्योग के नाम पर व्यापारी घराने, बांध, आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थान और नौकरशाही की गठन के जरिये भारत को न सिर्फ खंड खंड टुकड़ों में तोड़ दिया बल्कि इन नये थोपे गये हाड़खाऊ उपक्रमों में ऊपर से नीचे तक अपने जातीय और हितों के अनुरूप समर्पित लोगों को भर दिया।
उधर नेहरू के विजन के लिऐ जिनकी जमीनें इस महायज्ञ के लिये हड़पी गईं उन्हें आज तक कोई मुवावजा नहीं मिल पाया है।
ये तो शुरुआत थी। रीढ़ की हड्डी तोड़ी गयी हरित क्रांति के माध्यम से। किसान के बीज, बैल, खाद, दवाई सब छीन लिये गये। और उसके बदले में बीमार बनाने वाले, ज़मीन की उत्पादकता को जहरीला बनाने वाले रसायनों का अंधाधुंध उपयोग किया जाने लगा। सत्ता के बुद्धिजीवियों ने यह राग अलापना शुरू किया कि पारम्परिक खेती और धंधे घाटे का सौदा हैं। जबकि इससे लोगों को गुमराह कर दिया कि पारम्पारिक धंधों की वॉट तो खुद को सबसे बड़ा देशभक्त मानने वाले नेहरू पहले ही लगा चुके थे।
इसका एक बड़ा परिणाम यह हुआ कि अब किसान, मछुआरे, कारीगर, चरवाहे चाहें तो और न चाहें तो सरकार के लागू किये किये गये फ़िरौती की शक्ल में टैक्स देना ही पड़ेगा। क्योंकि सब कुछ का उत्पादन केंद्रीकृत हो गया था।
इसी जानलेवा प्रक्रिया को चरम पर पहुँचाया मनमोहन सिंह ने। किसी तरह बच गये किसानों को वैश्वीकरण के ज़लज़ले में झोंककर। कारीगर, मछुआरा, चरवाहा पहले ही महानगरों में मजूर बन चुका था, अब किसान भी मजूर बना दिया गया।
इधर आड़ में धर्म, सामाजिक न्याय, सेकुलरिज्म जैसे नारे गढ़े जाते रहे और हक़ीक़त में इन नारों, प्रवचनों और उन्माद के बहाने भारत की बहुत बड़ी आबादी को अँधेरे गड्ढे में धकेला जाता रहा।
नरेंद्र मोदी ने किसान की मौत के फ़रमान पर आख़िरी हस्ताक्षर किया है। जिसका सपना नेहरू जी ने देखा था उसे नरेंद्र मोदी ने पूरा किया है। अब जब नेहरू द्वारा पैदा किये नैक्सस की संतानों को किसान, चरवाहा, कारीगर, मछुआरा और आदिवासी लोग हर फील्ड में मात देने लगे तो सरकार बहादुर ने बचे हुये किसानों को बंधुआ बनाने की दिशा में आख़िरी कदम बढ़ा दिया है।
बाकी के रोजगार और नौकरी को निजीकरण के हवाले कर दिया है। अपने निकम्मे औलादों की हरामखोरी और दलाली को छिपाने के लिये कह दिया गया है कि सरकारी सेक्टर बहुत नुकसान की स्थिति में हैं। जबकि हक़ीक़त यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के डिसीजन मेकिंग बॉडी से लेकर क्लर्कों तक बैठाये गये लोग निक्कमे हैं। तत्काल हटाया उनको जाना चाहिये।
निजीकरण का मतलब ही अपने निजी लोगों को इकट्ठा करके दुकानदारी चलाना। जैसे पारम्परिक किसानी में घर, परिवार और रिश्तेदार अपने काम-धंधे के मामले में स्वतन्त्र और विमर्श करके निर्णय लेते थे वैसे ही निजीकरण में भी अपने ही भाई बंधुओं को सेटल किया जाता है आपको मजूर बनाया जाता है। अब तो ऑटोमेशन के ज़माने में आपकी ज़रूरत मजूर के रूप में भी खत्म हो गयी है। तो ऐसे में मनोज बाजपेई से एक गाना गवा दिया गया कि ‘बम्बई में का बा।’ यानि ये सोच रहे हैं कि शहरों से इन ज़बरन बनाये गये मजूरों का मोहभंग हो जाये और ऑटोमेशन को लागू करने के लिये कोई जोरजबरदस्ती, मजूरों से संघर्ष की स्थिति न बन सके। पहले हमें-आपको बीमार बनने को मज़बूर किया।
फिर मेडिकल माफ़िया के रूप में अपने औलादों को सेट किया। कारखानों के अपशिष्टों और उत्पाद से जमकर बीमार बनाया। अब जब मजूरों की भी कोई ज़रूरत नहीं रह गयी तो अस्पतालों को अपने ही देश के नागरिकों की पहुँच से दूर कर दिया। इलाज़ को इतना लुटेरा, महंगा और जटिल बना दिया कि मुल्क़ की नब्बे फ़ीसदी आबादी अपना उपचार ही न करा सके। इसके लिये देसी वैदकी (चिकित्सा पद्धति) को पहले ही तबाह और ग़ैरकानूनी घोषित कर दिया गया है। अब आपको अगर उपचार कराना है तो किसी तरीक़े से बच गयी ज़मीन और बच गये जेवर बेंच कर इलाज करवाइये। फिर भी आपके जिन्दा बचने का कोई चान्स नहीं है।
अब जिस तरीक़े के नियम क़ायदे क़ानून बना रहे हैं किसी भी सूरत में आप सरकारी नौकरी नहीं कर सकते। अम्बानियों, अदानियों की संपप्ति लाखों गुना बढ़ गयी और सरकार इतनी ग़रीब हो गयी है कि शोधार्थियों को कई महीने की फेलोशिप तक नही दिया है, अब कोई नौकरी नहीं दे सकती है। सारे विश्व्विद्यालय बन्द कर दिया है कि कहीं उनके ख़िलाफ़ विद्यार्थी इक्कठे होकर आकाओं के मंसूबे पूरे करने में कोई मुसीबत न पैदा कर दें। आप ट्वीट करते रहिये, अपने ही घरों में रहकर जितना विरोध हो करते रहिये। ऐसी जनसंहारी मशीनरी पर इसका कोई फरक नहीं पड़ता है।
तब तक हमें अपने बदतर से बदतर स्थिति में भी जिंदा रह पाने तक जिंदा रहने का गर्व बोध तो रहेगा ही। जब मर गये तो कोई बात ही नहीं।
