UNDERSTANDING MARX- PART III RICHARD D WOLFF के यूट्युब वीडियो का हिंदी अनुवाद

 

अमोल सरोज

सवाल- किसानों के सन्दर्भ में मार्क्सिस्ट नजरिया क्या कहता है? किसान को वर्किंग क्लास समझा जाये या बिजनेसमैन क्योंकि वो मजदूरों से काम भी करवाता है।

मैं आपको समझाने की कोशिश करता हूँ कि किसी भी आबादी (चाहे वो छोटा सा गांव हो, शहर हो स्टेट हो या देश हो) के लिये मार्क्सवादी नजरिया कैसे काम करता है। वो क्या बात है जो मार्क्स बताना चाहता था। हम वो देखने की कोशिश करते हैं जो बाकी सब देखने में नाकाम रहते हैं।

इंसानो का हर समुदाय, समाज, कम्युनिटी एक व्यवस्था के तहत काम करता है। ये सम्भव है कि लोगों को उस व्यवस्था के बारे मे न पता हो पर वो सब व्यवस्था के अधीन ही काम करते हैं। इंसान बहुत से काम करता है जिसके कारण के बारे मे वो नहीं बता पाता। लोग साइक्लोजिस्ट के पास जाते हैं, मेरी पत्नी भी साइक्लोजिस्ट है। साइक्लोजिस्ट उन चीजों के कारणों को समझाता है। मार्क्स ने सामजिक पैमाने पर चीजें समझाई। आप गौर करेंगे तो आपको दिखेगा कि हर कम्युनिटी में कुछ चीजें कॉमन होती हैं। ये अपने आप हो जाती हैं। हर कम्युनिटी अपनी आबादी में से कुछ सदस्यों को चुन लेती है। अगर सौ लोगों की काम्युनिटी है तो 20 लोग ले लिये। अगर 50000 की काम्युनिटी है तो x सदस्य ले लिये। उन लोगों को एक विशेष काम दे दिया जाता है, जिसमें उनकी दिमागी और जिस्मानी मेहनत लगती है। जैसे पेड़ की लकडी काटकर कुर्सी बना ली, जैसे भेड़ पाल कर ऊन बना ली।

अब कम्युनिटी में बहुत सदस्य होते हैं, जिनसे ये सब काम करने की अपेक्षा नहीं की जाती है। जैसे कोई दो साल के बच्चे से काम करने को नहीं कहेगा क्योंकि वो दो साल का है। कोई 80 साल के बूढ़े इंसान से भी काम करने की अपेक्षा नहीं रखेगा। तो इसका मतलब हुआ कि हर कम्युनिटी में जो लोग काम करते हैं उन्हे जितनी खुद को जरुरत है हमेशा उससे ‘ज्यादा’ उत्पादन करना पड़ता है, नहीं तो कम्युनिटी के बाकी सदस्य जिंदा नहीं रह पायेंगे। वे बच्चों को, बूढ़ो को कपड़े, खाना, घर मुहैया करवाते हैं। अब मार्क्स यहाँ कहते है कि सारा मसला यही है कि सोसाइटी इस ‘ज्यादा उत्पादन’ को कैसे डील करती है। ज्यादा उत्पादन करने के लिये मार्क्सिस्ट ‘SURPLUS’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। लोगों द्वारा अपनी जरुरत से ज्यादा उत्पादन करने को वो SURPLUS कहते हैं। जर्मन में इसकी जगह ‘MEHR’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है। M-E-H-R शब्द का मतलब निकलता है, MORE यानि ज्यादा। ये आसान है, स्पष्ट है। सरप्लस से लगता है कि कोई भारी भरकम बात है पर ऐसा है नहीं लेकिन अंग्रेजी में अनुवाद यही हुआ है। तो हर सोसाइटी ‘अधिरोष’ ‘अधिशेष’ ‘ज्यादा उत्पादन’ पैदा करती है। ये हर कम्युनिटी में होता है।

एक कम्युनिटी दूसरी कम्युनिटी से अलग सिर्फ इसी बात में है कि वहाँ कौन लोग है जो ‘ज्यादा’ का उत्पादन करते हैं। और कौन लोग हैं जो ये निर्णय लेते है कि ‘कितना’ ज्यादा उत्पादन करता है और उस ज्यादा का कैसे बंटवारा किया जायेगा। ये सब कैसे काम करेगा। यहीं से पॉलिटिक्स, सभ्यता, कला और संगीत निकलते हैं, फलते-फूलते हैं। दूसरे शब्दों में अगर आप पॉलिटिक्स, संस्कृति, कला और संगीत के बारे में जानना चाहते हैं तो उससे पहले आपको कुछ आधारभूत बातें समझनी चाहिये जैसे ‘ज्यादा का उत्पादन और उसका बंटवारा।’

इसी को मार्क्स का वर्ग विश्लेषण कहा जाता है, क्लास एनालिसस। एक वर्ग वो जो सरप्लस का उत्पादन करता है, दूसरा जो उसका बंटवारा करता है। सरप्लस को कैसे इस्तेमाल किया जाये इसका निर्णय लेते हैं। एक सिस्टम तो ये है जिसमें जो लोग ज्यादा उत्पादन करते हैं, उसका बंटवारा भी वही लोग करते हैं। वो आपस में तय करते हैं कि ये जो ज्यादा बचा हुआ है, इसका क्या किया जाये? वो इसे बच्चों में बाँटते हैं, बूढ़ों को देते हैं, संगीतकारों को देते हैं या और भी लोगों को देते हैं जिन्हें वो देना ठीक समझते हैं। वो अगर खेतों मे काम करते वक्त गाना सुनना चाहते हैं तो गायक पैदा होते हैं। वो गायकों, संगीतकारों, चित्रकारों के खाने पीने रहन सहन का ख्याल रखते हैं।

पर हमारे पास एक दूसरा सिस्टम भी है। इस सिस्टम में जो लोग ज्यादा उत्पादन करते हैं उन्हे हम एक नाम दे देते हैं- गुलाम। उनका उस उत्पादन पर हक नहीं होता है। अब तो आप समझ ही गये होंगे कि वो ज्यादा उत्पादन किसे मिलता है- उन लोगों को, जिन्हे मालिक कहा जाता है।इसमें ज्यादा उत्पादन का इस्तेमाल कौन करता है? -मालिक।

अब दस साल का बच्चा भी ये बात समझ सकता है कि मालिक ज्यादा उत्पादन का इस्तेमाल उस तरह से नहीं करेंगे, जिस तरह से वो मजदूर करते जिन्होने उस सरप्लस का निर्माण किया है। मजदूर सहभागी संस्था वह होती है जिसमें मजदूर ही उत्पादन करते हैं और वो ही तय करते हैं कि ज्यादा उत्पादन का क्या करना है। यह बात उसे पूंजीवाद, गुलाम व्यवस्था या जागीरदारी से अलग करती है। गुलाम व्यवस्था में गुलाम उत्पादन करता है और हक सारा मालिक का होता है। मालिक तय करता है उत्पादन का इस्तेमाल कैसे करना है।
जागीरदार या सामंतवाद में भी किसान मज़दूर उत्पादन करते हैं और हक सारा जागीरदार का होता है। पूंजीवाद में सारा काम कर्मचारी करते हैं और उत्पादन पर सारा हक इम्पलॉयर का होता है जिसे मालिक ही कहा जाता है। कार्ल मार्क्स का क्रांतिकारी विचार कहता है कि हमें गुलाम-मालिक, किसान-जागीरदार, इम्पलॉयी-इम्पलॉयर से पीछा छुडाना होगा। हमें गुलाम नहीं चाहिये, हमें गरीब मज़दूर नहीं चाहिये, हम नहीं चाहते कि कुछ लोगों (चाहे उन्हे मालिक बोलो, नियोक्ता बोलो, जागीरदार बोलो, राजा बोलो) के हाथ में उत्पादन के इस्तेमाल के सारे अधिकार हों और उन सब लोगों को इस हक से महरूम कर दिया जाये, जिन्होने अपनी मेहनत से उत्पादन किया है।

अब मैं मूल सवाल पर आता हूँ। खेती, किसानी भी कोई अलग नहीं है ये भी गुलाम व्यवस्था, जागीरदारी, पूंजीवाद या समाजवाद किसी भी प्रणाली के तहत हो सकती है।
आप साउथ अमेरिका को याद करो। लम्बे समय तक गुलामों ने खेतों में हाड़तोड़ मेहनत की और मालिकों ने उनकी मेहनत के दम पर बड़े-बड़े बंगले बना लिये। ज्यादा उत्पादन किया गुलामों ने, ज्यादा उत्पादन का क्या करना है ये तय किया मालिकों ने।

आप भारत में देखो जहाँ किसानों ने अपनी मेहनत से ज्यादा उत्पादन किया और जागीरदारों, राजाओं ने उस उत्पादन का इस्तेमाल अपने महल बनाने के लिये किया। आज आप टूरिस्ट के तौर पर जाते हो उदयपूर का शानदार महल देखने, मैसूर, ग्वालियर का महल देखने। आपको लगता है जिन मज़दूर-किसानों ने खेतो में अपना खून पसीना एक किया है। अगर उन्हे फैसला करने का हक होता तो वो मात्र पांच दस इंसानों के लिये ऐसे महल बनाने की इजाजत देते? बिल्कुल नहीं देते।

हजारों लाखों कर्मचारी कूरियर बनकर हर रोज लोगों का सामान उन तक पहुंचाते हैं। मेहनत भरे इस काम से जो करोड़ों की सम्पदा का उत्पादन होता है उसे खर्चने का हक किस को है? Jeff Bezos को। अमेज़न का मालिक है ये। काम क्या है? पैकेज डिलीवर करता है। ये दुनिया का सबसे अमीर आदमी है। सही है! पैकेज डिलीवर करने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम और क्या होगा! कोई भी जागरुक और तार्किक सोसाइटी सबसे ज्यादा पैसे उसे ही देगी जो पैकेज जल्दी डिलीवर करता हो! ऐसे आदमी के पास तो 150 बिलियन डॉलर होने बनते ही हैं। उसने अभी अपनी पत्नी को तलाक दिया है। तलाक के एवज में उसकी पत्नी को 39 मिलियन डॉलर मिले हैं। अब उसकी पूर्व पत्नी दुनिया की 22वीं सबसे अमीर इंसान है। सच बताना आपको क्या लगता है? अगर अमेज़न के सभी कर्मचारी, जो अपनी मेहनत से सारी दुनिया में सामन पहुंचाते हैं, जिनके दम पर ये अकूत सम्पदा एकत्रित हुई है, अगर उन सबको मौका मिले कि वो एक साथ बैठकर ये तय कर सकें कि इस सरप्लस का क्या करना है, तो वो क्या करेंगे? क्या वो ये सारा पैसा जैफ बिज़ोस जैसे आदमी को दे देंगे जो चांद पर घूमने की तैयारी कर रहा है? वो लोग जो सारा दिन अपना पसीना बहाते हैं, वो क्या यही चाहते हैं कि उनकी मेहनत से अर्जित की गयी सम्पदा से एक आदमी को चांद की सैर करवा दी जाये? (चांद से वापिस धरती पर न लाने की शर्त पर तो शायद कुछ लोग सहमत हो भी जाये।)

अब खेती की बात करते है। तो हाँ दुनिया भर में ऐसी किसान कम्युनिटी हुई है, आज भी है जो मिलकर खेती करते हैं, मिलकर पशु पालते हैं और उनकी खुद की जरुरत से ज्यादा उत्पादन होता है। सारे लोग मिल बैठ-कर सामूहिक रूप से तय करते हैं कि उसका क्या करना है। जो काम्युनिटी इस तरह की व्यवस्था से काम करती है, जिसमें कम्युनिटी तय करती है कि ज्यादा उत्पादन का क्या किया जाये उसे मार्क्स ने एक नाम दिया है ‘COMMUNISM’
और इस तरह काम करने वाली काम्युनिटी के लोगों को कहा जाता है ‘COMMUNIST.’ यस, मिलबांट कर खाने वालों को, सबके साथ रहने वाले, चलने वालों को काम्युनिष्ट कहा जाता है और जिसे हम बचपन मे एकलखोरा कह कर चिढ़ाते थे, जो दूसरों का हिस्सा भी खाने की फिराक में रहता था उसे ही कैपिटिलिस्ट कहा गया है। हर माँ बाप अपने बच्चों को कम्युनिजम की शिक्षा देते हैं। मिलबांट कर खाना चाहिये, सब के साथ खेलना चाहिये, एकलखोरा नहीं बनना चाहिये।

Community में से ‘ism’ हटा दो तो ये भयभीत नहीं करता है। आप इसे इस तरह से समझाओ तो लोग इसे जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। उन्हे ये किसी दूसरी दुनिया की बात नहीं लगती है। मैं जब लोगों को ऐसे बताता हूँ तो वो अपने आस-पास इसे महसूस करने लगते है। हाँ मेरे दादा-दादी ऐसे ही करते थे। पर जब मैं बताता हूँ कि ये कम्युनिजम है तो उनको हल्का हार्ट अटैक महसूस होने लगता है। मैं एक बार सिलिकॉन वैली में गया तो वहाँ मैं कुछ इंजीनियर्स से मिला था जो बड़ी बड़ी कम्पनियों से इस्तीफा देकर साथ आए थे। सबको वहाँ दो लाख से तीन लाख डॉलर तक की तनख़ाह मिलती थी, पर सबको कॉरपोरेट कल्चर से नफरत थी। सूट पहने एक आदमी आता था, उन्हे आदेश देता था कि उन्हे क्या सॉफ्टवेयर डेवलप करना है। उन्हे टाई पहनने में कोफ्त महसूस होती थी तो सबने जॉब छोड़ दी और किसी के गैराज में खुद का काम करना शुरु कर दिया। वे हर रोज अपना लैपटॉप लेकर आते। मस्ती में काम करते। कोई अपना कुत्ता साथ ले आता, कोई निक्कर में आ जाता। हफ़्ते मे चार दिन काम करते और पांचवे दिन सब मिलकर तय करते कि आगे क्या करना है। मैंने कहा वॉव! आप लोग तो कम्युनिस्ट हो, वो सब आंतकित हो गये। वो कहने लगे नहीं-नहीं हम तो ‘ENTREPRENEUR’ हैं। मैंने कहा- तुम इसे बैगनी जिराफ कह लो मुझे क्या फर्क पडता है। मैं तुम्हे बता रहा हूँ कि तुम लोगों पूंजीवाद को ठोकर मारी, पूंजीवादी नौकर छोड़ी, सब एक साथ आये और एक कम्युनिस्ट संस्था की स्थापना की। उन्होने मुझे बताया कि जब से उन्होने ये नया काम शुरु किया है उन्हे बहुत मजा आना शुरु हो गया है। जो विचार उन्हे अब आ रहे हैं, वो पहले नहीं आते थे। उन सबको एक दूसरे का साथ और इस तरह से काम करना रास आ रहा था। मैंने उनसे कहा कि तुम लोग कम्युनिज्म का बेहतरीन इश्तिहार हो।

वापिस खेती किसानी की तरफ लौटते हैं। क्या किसान कैपिटालिस्ट हो सकते हैं? बिल्कुल हो सकते हैं। क्या खेती पूंजीवादी तरीके से हो सकती है, बिल्कुल हो सकती है, हो रही है। क्या किसान कम्युनिष्ट हो सकते हैं? बिल्कुल हो सकते हैं। क्या खेती कम्युनिज्म तरीके से हो सकती है, बिल्कुल हो सकती है, हुई है, हो रही है।

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9 Thoughts to “UNDERSTANDING MARX- PART III RICHARD D WOLFF के यूट्युब वीडियो का हिंदी अनुवाद”

  1. PRAGATI YADAV

    बहुत बेहतरीन जानकारी

    1. धन्यवाद मित्र

    2. उत्साहवर्द्धन के लिए धन्यवाद

    3. सहयोग बनाये रखिये।भविष्य में और बेहतर के लिए आपके सुझाव आमंत्रित रहेंगे।

    4. धन्यवाद

    5. प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद

  2. AMit Ahir

    बहुत उम्दा जानकारी

    1. धन्यवाद

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