वर्णवाद के अस्तित्व का फर्जी आधार।

डॉ.मुकेश कुमार मीणा।

यह सब जानते है कि इंडिया में वैदिक साहित्य को ट्रांसलेट करके आर्य थ्योरी का रूप देने वाले अंग्रेज थे और उनके द्वारा ट्रांसलेटेड वैदिक साहित्य के आधार पर ही वर्ण व्यवस्था का प्रचार और स्थापना हुयी । साहित्य के ट्रांसलेशन के बाद प्रसार का कार्य उन्होंने अपने पालतू समाज सुधारको से सुधार के नाम पर करवाया। इन समाज सुधारको के द्वारा सुधार के नाम पर ऐसे ट्रांसलेटेड साहित्य को स्थापित किया जो मूल रूप से इंडियन उप महाद्वीप का नहीं था या केवल छोटे से शरणार्थी वर्ग से सम्बन्धित था। यह साहित्य ब्राह्मणिकल वर्णवादी साहित्य था

अंग्रेजो से पहले कभी इंडिया का समाज इस वर्णवादी फार्मेट में नही रहा था क्योकि अंग्रेजो से पहले ना तो संचार के साधन थे न ही देश के सभी भागों तक इतना आपस मे सम्पर्क था और ना ही कोई इस तरह की सत्ता जो सभी वर्गो और जातियों को वर्ण के एक तंत्र में डालने की इच्छुक हो । जमीनी हकीकत आज भी गांवों में इस वर्ण व्यवस्था के अनुकूल नही है हर स्थान पर M N श्रीनिवासन का प्रभुत्व जाती का सिद्धान्त अधिक उपयुक्त दिखाई देता है जो बतलाता है कि हर स्थान पर सत्ता और स्थानीय लोगो के द्वारा स्थानीय प्रभुता वाली कृषक जाती का ही अनुसरण किया जाता है । शहर तो भारतीय इतिहास में नये नये बसे हुए हैं वहा का स्तरीकरण अलग है ।
अब प्रश्न उत्पन होता है कि अंग्रेजो ने वर्णवादी साहित्य को क्यों स्थापित किया ।अंग्रेजो की वर्ण जैसी व्यवस्था को स्थापित करने में क्या रूचि थी ? इसका उत्तर है कि अंग्रेज इण्डिया को लम्बे समय तक गुलाम बनाए रखना चाहते थे और इसके लिए वो वर्ण के सिद्धान्त का प्रयोग कर यहाँ एक मिडिल मैन तैयार करना चाहते थे , जिससे वो केवल ऊपर के स्तर के लोगो को निर्देश दे और यहाँ के ऊपर के लोग नीचे के लोगो को नियंत्रित कर सकें तथा उनका काम आसानी से चल सके ।ऐसा करने के लिए यहाँ के अशिक्षित समाज में यह धर्म के माध्यम से ऐसे नियमो को स्थापित करना बहुत आसान था बजाय और किसी तरीके के । यह सब एक सामान्य संगठन के नियमो के अनुकूल व्यवस्था है जिसको कोई भी स्कॉलर आसानी से समझ सकता है ।अंग्रेजो को मुख्यता तीन प्रकार के सीधे सहायको की जरूरत थी जिनको उन्होंने वर्ण बना दिया । ऐसा नही है कि वर्ण की अवधारणा पहले नही थी पर अंग्रेजो ने इस अवधारणा को मूर्त रूप दिया । अंग्रेजो ने इन वर्गो को इनके अनुसार कार्य भी दिया ब्राह्मण जातीयों को शिक्षा और सरकार में बाबू का कार्य, इसके साथ धर्म का कार्य वो पहले से कर रहा था , व्यापारियों को विदेशी को बेचने का कार्य और व्यापार, और सूदखोरी का धंधा वो पहले से ही कर रहा था , राजपूतो को जमीदारी का ठेका और लगान वसूली तथा अन्य को शारीरिक श्रम की नोकरिया और खेती किसानी और मजदूरी के अवसर । अंग्रेजो की इस ट्रेनिंग से वर्ण व्यवस्था ने एक शेप लिया जो इससे पहले कभी भी इस शेप में नही था, अर्थात भारतीय समाज में धर्म आधारित समाज को मूर्त रूप देने में अंग्रेजो का महत्वपूर्ण योगदान है जो अंग्रेजो ने अपने शासन के प्रारम्भिक 150 सालो में किया, भले ही बाद के काल मे अंग्ररेजो ने कोई हस्तक्षेप नही किया हो । इसमे भारतीय समाज के वर्ण व्यवस्था से सामाजिक और आर्थिक रूप से लाभान्वित समाज ने भी सहयोग किया और अपने साहित्य और परम्परा को वर्णवादी साहित्य के ढाचे में डाल लिया जो भले ही यहाँ के साहित्य से सम्बंधित नही रहा हो । बाद के वर्षो में कांग्रेस और अन्य संगठनो ने इस वर्ण व्यवस्था को सांकेतिक रूप से स्थापित रखने में अपने पुरे प्रयास लगा दिए ।कांग्रेस की स्थापना और बीसवी शताब्दी के शुरू मे इस तरह के संगठन और उनके प्रयास स्पष्ट दिखाई देते हैं
आर्यन थ्योरी की स्थापना और खंडन होता रहा है लेकिन आर्यन थ्योरी से इस्टेब्लिश वर्णवादी व्यवस्था की और लोगो का ध्यान नही जाता है ।अंग्रेजो के द्वारा ट्रांसलेटेड साहित्य से उत्पन्न वर्ण व्यवस्था में स्थापित गोत्र और संख्या में छोटी जातीय समूहों ने अपने साहित्य का विस्तार शुरू कर दिया था और अपने वर्ण के अनुसार साहित्य निर्मित साहित्य को स्थानीय आधार देना शुरू कर दिया जिसका खंडन कोई नही कर रहा था ।संस्थाओं पर कब्जा होने के कारण इनके साहित्य को स्वीकार्यता मिलने लगी भले ही तर्क की कसोटी पर वो साहित्य खरा नही उतरता हो । वर्ण में सम्मिलित लोग ज्यादातर वो थे जो या तो बाहर से आये थे या अंग्रेजो के सहायक बन चुके थे। अंग्रेजो ने इंडिया की जनसंख्या का सर्वे किया तथा इन्डियन कास्ट एक्ट बनाया गया । बाद में अंग्रेजो ने अपने बनाए गए डोकुमेंट में इनको जातियों के रूप में लिखना शुरू किया और जातियों को वर्ण से सम्बन्घित करना शुरू कर दिया । जातियों को वर्ण के फोर्मेट मे डालने का प्रयास समय – समय पर होता रहा है पर वो कभी तार्किक रूप से सफल नही हो पाया ।
यदि आर्यन थ्योरी फेल हो जाती है तो वर्णवादी साहित्य भी फेल हो जायगा, इसलिए आर्यन थ्योरी को इस्टेबलिश करने के लिए ऐसे समूहों की जरूरत थी जिनको पश्चिम से आये आर्य घोषित किया जा सके | पूर्व से आये लोगो की नस्ल तो आसानी से पहचानी जा सकती है । इस कड़ी में नार्थ इंण्डिया की मार्शल जातियों को चुना गया। मार्शल जातियों में जाटो को इसमे सबसे उपयुक्त पाया गया क्योकी पश्चिम से आने वाली जाती का शारीरिक रूप से मजबूत होना जरुरी है और ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत शारीरिक रूप से अन्य जातियों की तुलना में कमजोर दिखाई देते है ।जाटो को आर्य समाजी बनाकार इस कार्य को पूरा किया गया । जाटो के साथ साथ अहीरों राजपूतो से सम्बन्ध होने के कारण गुर्जरों , जहा बहुमत में है वहा मीणाओ को भी आर्य समूह के क्षत्रिय बनाकर वर्णवादी व्यवस्था को आधार देने की कोशिश की गयी । जबकि ये सब स्थानीय जातीय समुह है जो कभी किसी वर्ण के हिस्से नही रहे है ।
अब जब वर्ण में स्थापित शरणार्थी और अन्य समूह प्रशासन –बाजार-शिक्षा और राजनीति के कारण स्थापित हो चुके है तो इन्ही मार्शल जातियों को वर्ण के क्षत्रिय से शुद्र बनाया जा रहा है यही प्रवृत्ति मार्शल कोम की ताकत के बल पर अन्य छोटी जातियों में भी स्थापित कर दी गयी , किसी को आवश्यकता अनुसार शूद्र बनाया किसी को क्षत्रिय किसी को वैश्य और फिर जरूरत पडी तो इन्ही को पिछड़े और शूद्र बना दिया ।यह सोशल इन्जीयरिंगकी राजनीती अपने को स्थापित करके समाज के संसाधनों पर कब्जा करने की है, जो अंग्रेजो से शुरू हुयी और जिसका सैद्धांतिक आधार आर्य थ्योरी के साथ ख़त्म होने के बाद आज भी चल रहा है क्योंकि यह स्थापित वर्ग को लाभ देती है। इंडिया की सामाजिक संरचना जातीय समाजों से बनी है जिसमे बाहर से आये लोग वर्ण के रूप में स्थापित हैं और अन्य लोग दलितों तथा दुसरे धर्मो के रूप में स्थापित हैं, जो अपने -अपने कारणों से वर्ण वाद को ऐतिहासिक बतलाते हैं।

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One Thought to “वर्णवाद के अस्तित्व का फर्जी आधार।”

  1. Amit Ahir

    उम्दा

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